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14 साल से कम उम्र के बच्चों की धार्मिक शिक्षा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्रीय शिक्षा सचिव को अवमानना नोटिस जारी

14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों के पंजीकरण और नियमन से जुड़ी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय शिक्षा सचिव टी.के. अनिल कुमार को नोटिस जारी किया है। यह याचिका अदालत के उस पूर्व आदेश का पालन न करने के विरोध में दायर की गई है, जिसमें सरकार को छोटे बच्चों को धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा देने वाले संस्थानों की निगरानी से जुड़े प्रतिवेदन पर विचार करने का निर्देश दिया गया था।

अदालत का रुख और सुनवाई की स्थिति

सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करने के साथ ही केंद्रीय शिक्षा सचिव को अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने से फिलहाल छूट दे दी है। इस मामले की अगली सुनवाई अब चार सप्ताह बाद तय की गई है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने उनके आवेदन पर समय रहते कोई निर्णय नहीं लिया, जिसके कारण उन्हें अदालत की अवमानना याचिका दाखिल करनी पड़ी।

गैर-पंजीकृत संस्थानों पर याचिकाकर्ता के गंभीर आरोप

याचिका में दावा किया गया है कि देश भर में हजारों गैर-पंजीकृत संस्थान बिना किसी सरकारी निगरानी और नियंत्रण के संचालित हो रहे हैं और बच्चों को धार्मिक शिक्षा दे रहे हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, उचित राज्य पर्यवेक्षण के बिना चल रही यह व्यवस्था देश की आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक सौहार्द, राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए चिंता का विषय बन सकती है। इसके अलावा, कम उम्र में ही बच्चों के धर्म के नाम पर प्रभावित या भ्रमित होने की आशंका भी जताई गई है। हालांकि, ये सभी आरोप याचिकाकर्ता के हैं और शीर्ष अदालत ने इन पर अभी कोई टिप्पणी या निर्णय नहीं दिया है।

संविधान के अनुच्छेद 30 के दायरे पर उठाए सवाल

इस याचिका के माध्यम से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 के अर्थ और क्रियान्वयन की नए सिरे से व्याख्या करने की मांग भी की गई है, जो अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने का अधिकार देता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि अर्ध-धार्मिक या अल्पसंख्यक संस्थानों को अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत उपलब्ध सामान्य अधिकारों से अधिक सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए। याचिका में कहा गया है कि अनुच्छेद 30(ए) का लाभ केवल धर्मनिरपेक्ष या व्यावसायिक संस्थानों को मिलना चाहिए, जबकि किसी विशिष्ट धर्म के प्रचार में लगे संस्थानों को अनुच्छेद 26(ए) के तहत देखा जाना चाहिए।

 

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