हल्द्वानी के बनभूलपुरा रेलवे भूमि अतिक्रमण मामले में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तावित सुनवाई नहीं हो सकी। केस कोर्ट की सूची में तीसरे नंबर पर था, लेकिन संबंधित वकीलों के पेश न होने के कारण सुनवाई टल गई। अब अगली तारीख को लेकर कोर्ट की ओर से जानकारी सामने आने का इंतजार है।
बनभूलपुरा में सुरक्षा बढ़ाई गई
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की संभावना को देखते हुए पुलिस ने बनभूलपुरा इलाके को अलग-अलग जोन और सेक्टर में बांटकर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की थी। संवेदनशील इलाकों में आंसू गैस दस्ते, दंगा-रोधी टीम और सशस्त्र बल तैनात किए गए थे। इसके अलावा इलाके की गतिविधियों पर ड्रोन के जरिए भी नजर रखी जा रही थी। यह विवाद हल्द्वानी रेलवे स्टेशन के आसपास बसे बनभूलपुरा, गफूर बस्ती, ढोलक बस्ती और इंदिरा नगर से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार करीब 30.040 हेक्टेयर सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण का मामला है। इससे लगभग 4,365 मकानों और 50 हजार से अधिक लोगों के प्रभावित होने की बात सामने आई है।
2007 से अदालतों में चल रहा जमीन का विवाद
रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने को लेकर कानूनी विवाद वर्ष 2007 से चल रहा है। रेलवे और राज्य सरकार की ओर से अलग-अलग समय पर जमीन खाली कराने की कोशिश हुई, लेकिन प्रभावित लोगों की कानूनी चुनौतियों के कारण मामला अदालतों में बना रहा। दिसंबर 2022 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रेलवे को एक सप्ताह का नोटिस देकर अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया था। जरूरत पड़ने पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों की सहायता लेने की अनुमति भी दी गई थी। इसके बाद प्रभावित लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने बेदखली पर रोक लगाते हुए कहा था कि इतने बड़े पैमाने पर लोगों को रातों-रात बेघर नहीं किया जा सकता। आगे की सुनवाई में पुनर्वास के मानवीय पहलू पर भी जोर दिया गया।
रेलवे और प्रभावित परिवारों के दावे अलग-अलग
रेलवे का कहना है कि विवादित जमीन उसके रिकॉर्ड में दर्ज है और हल्द्वानी प्रोजेक्ट के तहत रेलवे लाइन के रियलाइन्मेंट के लिए करीब 30.65 हेक्टेयर जमीन की जरूरत है। अपने दावे के समर्थन में रेलवे ने पुराने नक्शों, 1959 की अधिसूचना, 1971 के राजस्व रिकॉर्ड और 2017 के सर्वे का हवाला दिया है।
दूसरी ओर, प्रभावित परिवारों का कहना है कि वे इस क्षेत्र में कई दशकों से रह रहे हैं। उनका दावा है कि उनके नाम नगर निगम के हाउस टैक्स रिकॉर्ड में दर्ज हैं और कई घरों में बिजली-पानी के कनेक्शन भी हैं। कुछ परिवारों ने जमीन और मकानों पर अपने अधिकार से जुड़े दस्तावेज भी अदालत के समक्ष पेश किए हैं।
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