भारतीय सेना की सबसे वीर और सम्मानित इकाइयों में से एक ‘सिख रेजिमेंट’ में पंजाब के युवाओं की भर्ती में महत्वपूर्ण सुधार देखा गया है। वर्ष 2022 में लागू हुई ‘अग्निपथ योजना’ के बाद और कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में युवाओं के बड़े पैमाने पर पलायन के कारण रेजिमेंट में भर्ती के आंकड़ों में भारी गिरावट आई थी। वर्ष 2024-25 में रेजिमेंट में खाली पदों में से केवल 25 प्रतिशत ही भरे जा सके थे। हालांकि, सेना के गहन आउटरीच अभियानों और पिछली बची हुई रिक्तियों को आगे बढ़ाने के बाद वर्ष 2025-26 में यह आंकड़ा बढ़कर 50 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
सेना ने शुरू किया विशेष आउटरीच अभियान
रेजिमेंट के गौरवशाली इतिहास को पुनर्जीवित करने के लिए सिख रेजीमेंटल सेंटर, वरिष्ठ सेना अधिकारियों, मैदानी टुकड़ियों और पूर्व सैनिकों ने मिलकर “आओ, सेना में शामिल हों। आओ, सिख रेजिमेंट में शामिल हों।” नारे के साथ एक विशेष जागरूकता अभियान चलाया। भर्ती टीमों ने पंजाब के गांवों का दौरा कर सरपंचों और स्थानीय निवासियों से संपर्क किया। पंजाब में तैनात बटालियनों को भी संभावित उम्मीदवारों की पहचान करने की जिम्मेदारी दी गई। एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, सिख रेजिमेंट अकेली ऐसी रेजिमेंट थी जो भर्ती की भारी कमी का सामना कर रही थी।
कमी के कारण और सेना की नई रणनीति
सेना अधिकारियों के मुताबिक अग्निपथ योजना को लेकर नकारात्मक धारणाएं, 4 साल की सेवा के बाद रोजगार की चिंता, विदेश जाने की होड़, नशे की लत, गैंगस्टर संस्कृति और शारीरिक मानकों पर खरा न उतर पाना भर्ती में गिरावट के मुख्य कारण थे। इन चुनौतियों से निपटने के लिए सेना ने सीमावर्ती इलाकों में नशा विरोधी कार्यक्रमों के साथ भर्ती अभियानों को जोड़ा। इसके अलावा पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और थल सेनाध्यक्ष जनरल धीरज सेठ की हालिया बैठक में भी पंजाब से भर्ती और अग्निवीरों के लिए सेवानिवृत्ति के बाद रोजगार के अवसरों पर विस्तृत चर्चा हुई थी।
सिख रेजिमेंट का गौरवशाली इतिहास
अगस्त 1846 में स्थापित सिख रेजिमेंट भारतीय सेना की सबसे सुसज्जित रेजिमेंटों में शामिल है। इसे अब तक 14 विक्टोरिया क्रॉस, 2 परमवीर चक्र, 4 अशोक चक्र, 75 बैटल ऑनर्स और 38 थिएटर ऑनर्स मिल चुके हैं। पंजाब राज्य से सेना में हर साल लगभग 8,000 रिक्तियां निकलती हैं, जो सिख लाइट इन्फैंट्री और पंजाब रेजिमेंट में भी योगदान देती हैं। विशेष रूप से जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला, गुरदासपुर, पठानकोट, अमृतसर और तरनतारन जैसे जिले पारंपरिक रूप से सेना को बड़ी संख्या में सैनिक देते रहे हैं।
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