पाकिस्तान की विदेश नीति और रणनीतिक समझौते एक बार फिर गहरे संकट के घेरे में आ गए हैं। भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित पाकिस्तान ने एक छत्रछाया हासिल करने के उद्देश्य से पहले सऊदी अरब के साथ द्विपक्षीय रक्षा समझौता किया और बाद में इसमें तुर्की को भी शामिल कर लिया। इस त्रिपक्षीय गठबंधन को ‘मक्का पैक्ट’ के तहत एक तरह का ‘इस्लामिक नाटो’ कहा गया, जिसमें एक-दूसरे पर हुए हमले को पूरे समूह पर हमला मानने का वादा किया गया था। हालांकि, पश्चिम एशिया में गहराते सैन्य संकट और ईरान-हूती संघर्ष के बीच यह गठबंधन धरातल पर पूरी तरह बेअसर और खोखला साबित होता दिख रहा है।
हूती विद्रोहियों के हमलों से सऊदी अरब को भारी आर्थिक झटका
लाल सागर और पश्चिम एशियाई क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के प्रमुख बुनियादी ढांचों पर जबर्दस्त हमले बोल दिए हैं। हूतियों ने सऊदी अरब की उस सबसे महत्वपूर्ण तेल पाइपलाइन को निशाना बनाकर क्षतिग्रस्त कर दिया, जो वैश्विक दैनिक तेल आपूर्ति के लगभग 4 प्रतिशत हिस्से का संचालन करती है। लगातार हमलों के चलते सऊदी के इस महत्वपूर्ण पोर्ट पर अब महज 4 से 5 दिनों का ही तेल भंडार शेष बचा है। यदि स्थिति में तुरंत सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की भीषण किल्लत हो सकती है, जिससे वैश्विक स्तर पर कीमतें आसमान छू सकती हैं।
संकट के समय धरातल पर नहीं दिखे तुर्की और पाकिस्तान
सऊदी अरब पर हुए इस बड़े हमले के बाद समझौते के प्रावधानों के अनुसार तुर्की और पाकिस्तान को तुरंत जमीनी सैन्य सहायता के लिए आगे आना चाहिए था। लेकिन समझौते के बावजूद दोनों ही देश केवल जुबानी और कूटनीतिक बयानों तक सीमित नजर आ रहे हैं। तुर्की ने इस संकट के बीच यह कहकर पल्ला झाड़ लिया है कि वह केवल ‘रक्षात्मक नजरिये’ से साथ खड़ा है। दूसरी ओर, जब पाकिस्तान ने सऊदी अरब की ओर से ईरान के सामने मध्यस्थता करने की कोशिश की, तो ईरान ने उसे सीधे तौर पर झिड़क दिया और स्पष्ट कर दिया कि हूती विद्रोहियों पर उसका कोई सीधा नियंत्रण नहीं है।
भारत के खौफ में बना ‘इस्लामिक नाटो’ बिखरने की कगार पर
विश्लेषकों का मानना है कि भारत के कड़े सैन्य रुख और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से उपजे डर के कारण ही पाकिस्तान ने सऊदी और तुर्की के साथ यह रक्षा समूह बनाया था। किंतु क्षेत्रीय वास्तविकताओं और कूटनीतिक जटिलताओं के सामने इस गुट की सीमाएं उजागर हो गई हैं। पाकिस्तान अपनी भौगोलिक निकटता और आंतरिक समीकरणों के चलते ईरान से सीधा विवाद मोल लेने से बच रहा है। संकट की इस घड़ी में व्यावहारिक सैन्य मदद देने के बजाय पाकिस्तान और तुर्की द्वारा केवल खोखली निंदा और बयानबाजी करने से अब इस त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौते के भविष्य और औचित्य पर ही गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
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