Kishau Dam Project: उत्तराखंड समेत छह राज्यों के लिए लंबे समय से प्रतीक्षित किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना को लेकर आज नई दिल्ली में अहम बैठक होने जा रही है। बैठक में छह राज्यों के बीच समझौता ज्ञापन यानी एमओयू पर हस्ताक्षर प्रस्तावित हैं। यदि प्रक्रिया तय योजना के अनुसार पूरी होती है तो वर्षों से अटकी परियोजना के धरातल पर उतरने का रास्ता काफी हद तक आसान हो सकता है। बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी मौजूद रहेंगे।
सहमति के अभाव में अटकी थी योजना
ऊपरी यमुना बेसिन में प्रस्तावित किशाऊ बांध का मकसद केवल बिजली बनाना नहीं, बल्कि कई राज्यों की पानी की जरूरतों को पूरा करना भी है। लंबे समय तक राज्यों के बीच परियोजना की लागत, पानी के बंटवारे और इससे मिलने वाले लाभों को लेकर सहमति नहीं बन पाई। अब केंद्र की पहल के बाद सभी पक्षों को एक मंच पर लाकर समझौते की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
उत्तराखंड को बिजली का फायदा
उत्तराखंड के लिए यह परियोजना खास महत्व रखती है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत राज्य को जल घटक की लागत नहीं उठानी होगी। हिमाचल प्रदेश के लिए भी यही व्यवस्था प्रस्तावित है। इसके बदले दोनों राज्यों को परियोजना से पैदा होने वाली बिजली में महत्वपूर्ण हिस्सा मिलने की उम्मीद है। इससे उत्तराखंड की ऊर्जा क्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
टोंस नदी पर बनेगा बांध
किशाऊ परियोजना यमुना की सहायक टोंस नदी पर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर प्रस्तावित है। इसकी जलविद्युत उत्पादन क्षमता 422 मेगावाट होगी। प्रस्तावित बांध की ऊंचाई 236 मीटर है, जो इसे देश की बड़ी बांध परियोजनाओं में शामिल करती है। इसमें 1324 एमसीएम पानी के भंडारण की क्षमता प्रस्तावित है।
97 हजार हेक्टेयर से ज्यादा सिंचाई
परियोजना से 97 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र को सिंचाई सुविधा मिलने का अनुमान है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली समेत छह राज्यों को इससे लाभ मिलने की योजना है। दिल्ली को अतिरिक्त पेयजल उपलब्ध कराने के साथ यमुना में बाढ़ नियंत्रण में भी परियोजना मददगार हो सकती है।
चार राज्यों को मिलेगा पानी
किशाऊ परियोजना के जरिए यमुना बेसिन के पानी को विभिन्न राज्यों के बीच बांटने की योजना है। प्रस्तावित व्यवस्था में हरियाणा को 836 क्यूसेक, उत्तर प्रदेश को 543.2 क्यूसेक, राजस्थान को 163.52 क्यूसेक और दिल्ली को 105.28 क्यूसेक पानी मिलने का प्रावधान है। इस वजह से यह परियोजना दिल्ली-एनसीआर की दीर्घकालिक जल जरूरतों के लिए भी अहम मानी जा रही है।
जल और बिजली पर सहमति चुनौती
परियोजना के सामने अभी कई चुनौतियां हैं। इनमें जल बंटवारे और बिजली में राज्यों की हिस्सेदारी पर अंतिम सहमति, परियोजना लागत का बंटवारा तथा पुनर्वास एवं मुआवजा पैकेज शामिल हैं। इसके अलावा 17 गांवों के जलमग्न होने और करीब 1000 परिवारों के विस्थापित होने की आशंका भी है।
लागत में हुआ बड़ा इजाफा
परियोजना के वर्षों तक लंबित रहने का असर इसकी लागत पर भी पड़ा है। वर्ष 2018 में किशाऊ बांध परियोजना की अनुमानित लागत करीब 11,550 करोड़ रुपये थी। निर्माण लागत बढ़ने और समय बीतने के साथ अब इसका अनुमानित खर्च करीब 15 हजार करोड़ रुपये पहुंच गया है। ऐसे में आगे की देरी से लागत और बढ़ने की चुनौती बनी हुई है।
एमओयू से खुलेगा निर्माण का रास्ता
आज की बैठक इसलिए अहम है क्योंकि छह राज्यों के बीच एमओयू पर सहमति बनने से परियोजना को संस्थागत आधार मिल सकता है। वर्षों की बातचीत यदि समझौते में बदलती है तो इसके बाद अन्य औपचारिकताओं और निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता खुल सकता है। उत्तराखंड के लिए किशाऊ परियोजना ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने के साथ क्षेत्रीय जल प्रबंधन में भी अहम भूमिका निभा सकती है।
कौन-कौन होगा शामिल
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में होने वाली इस बैठक में 6 राज्यों के बीच बिजली और पानी की हिस्सेदारी को लेकर अहम समझौता होगा। कर्तव्य भवन में होने वाली इस बैठक में केंद्रीय जलशक्ति मंत्री CR पाटिल के अलावा, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, दिल्ली की CM रेखा गुप्ता, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, हिमाचल सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा भी मौजूद रहेंगे। बैठक में 6 दशक से लंबित इस बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर MoU साइन होगा।
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