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सिर्फ व्हाट्सऐप चैट के आधार पर नहीं दी जा सकती सजा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में व्हाट्सऐप मैसेज के आधार पर हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल व्हाट्सऐप चैट के साक्ष्य किसी आरोपी की सजा को बरकरार रखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि इस मामले में संदेश भेजने वाले व्यक्ति ने खुद मैसेज भेजने से इनकार कर दिया था और अभियोजन पक्ष के मुख्य गवाह भी अपने बयानों से पलट गए थे।

क्या था पूरा मामला और हाईकोर्ट का फैसला

यह मामला 9 फरवरी 2019 का है, जब एक खुले मैदान में एक व्यक्ति का शव बरामद हुआ था, जिसके पास एक मोटरसाइकिल रस्सी से बंधी थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हत्या की आशंका जताए जाने के बाद अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। जांच के दौरान पुलिस ने आरोपी के बयान पर उसके घर से लोहे की रॉड, पेचकस, खून से सनी शर्ट और मिट्टी बरामद की थी। सत्र न्यायालय ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 और 201 के तहत दोषी ठहराया था, जिसे बाद में उच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

व्हाट्सऐप चैट को क्यों नहीं माना मुख्य सबूत

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था। पुलिस ने जांच के दौरान गवाह-5 और गवाह-6 के मोबाइल जब्त किए थे, जिसमें फॉरेंसिक जांच के दौरान 7-8 फरवरी 2019 की रात का एक व्हाट्सऐप मैसेज मिला था। इस मैसेज में आरोपी और मृतक के बीच लड़ाई और हत्या में उसकी संलिप्तता का जिक्र था। हालांकि, दोनों गवाहों ने अदालत में आरोपी को झगड़ते देखने और एक-दूसरे को ऐसा कोई मैसेज भेजने से साफ इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि गवाहों द्वारा घटना को अपनी आंखों से न देखने के कारण यह चैट केवल संदेह पैदा करती है, जो दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकती।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धाराओं पर कोर्ट की टिप्पणी

पीठ ने फैसले में स्पष्ट किया कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 6 के तहत इस चैट को सुनी-सुनाई बातों के अपवाद के रूप में भी स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि घटना और मौत का सही समय साबित नहीं हो सका था। इसके अतिरिक्त, अदालत ने कहा कि यदि इस चैट को धारा 7 के तहत प्रासंगिक मान भी लिया जाए, तब भी गवाहों के मुकर जाने के कारण इसका कानूनी महत्व समाप्त हो जाता है। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले को रद्द करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।

 

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