वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति के सबसे महत्वपूर्ण मार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को लेकर मचे घमासान के बीच एक बड़ी खबर सामने आई है। ईरान और ओमान ने लंबे समय तक चली कूटनीतिक और तकनीकी बातचीत के बाद होर्मुज में जहाजों के प्रवेश और निकास के लिए एक नई रूपरेखा तैयार कर ली है। अगस्त के अंत में अंतिम रूप दिए गए इस समझौते के तहत खाड़ी में प्रवेश करने वाला पूरा रास्ता और निकास मार्ग का एक हिस्सा अब ईरान के क्षेत्रीय समुद्री जलसीमा के भीतर रहेगा। मस्कट में आयोजित होने वाली क्षेत्रीय बैठक में ईरान, इराक और खाड़ी देशों के विदेश मंत्रियों को इस समझौते की पूरी जानकारी दी जाएगी।
अमेरिका की आपत्ति के बावजूद बंद होगा दक्षिणी रास्ता
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बागेई और अर्द्ध-सरकारी एजेंसी तस्नीम के अनुसार, नए तंत्र के लागू होते ही होर्मुज का दक्षिणी मार्ग बंद कर दिया जाएगा, जिसे खुला रखने पर अमेरिका लगातार जोर दे रहा था। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस समझौते का अर्थ जलमार्ग को पूरी तरह खोलना बिल्कुल नहीं है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के हमलों के जवाब में तेहरान द्वारा बंद किए गए इस जलमार्ग को दोबारा खोलने के लिए ईरान ने अमेरिका के समक्ष 7 शर्तें रखी हैं। जब तक अमेरिका इन शर्तों को पूरा नहीं करता और अपना रुख नहीं बदलता, तब तक यह रणनीतिक शिपिंग कॉरिडोर अस्थायी और नियंत्रित व्यवस्थाओं के तहत ही संचालित होगा।
भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और नई उम्मीदें
होर्मुज के दोनों तटीय देशों ईरान और ओमान के इस कदम का सबसे सकारात्मक असर भारत पर पड़ सकता है। एशियाई देशों की इस मार्ग पर भारी निर्भरता के बीच भारत के ईरान और ओमान दोनों के साथ ही गहरे ऐतिहासिक संबंध हैं। संकट के समय ओमानी नौसेना भारतीय जहाजों के बचाव में हमेशा आगे रही है। इसके साथ ही 1990 के दशक से लंबित 5 अरब डॉलर की बहुउद्देशीय ‘ओमान-भारत गहरे पानी की पाइपलाइन’ परियोजना को अब नई संजीवनी मिल सकती है। समुद्र तल से 3500 मीटर नीचे बिछाई जाने वाली यह 1600 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन ओमान के रास अल जिफान से गुजरात के पोरबंदर को सीधे जोड़ेगी। इस एनर्जी कॉरिडोर के शुरू होते ही भारत की स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर निर्भरता काफी हद तक कम हो जाएगी।
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