आधुनिक युद्ध में GPS की भूमिका बेहद अहम हो गई है। गाइडेड मिसाइलों, ड्रोन और लंबी दूरी की आर्टिलरी को सटीक लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए सैटेलाइट से मिलने वाले पोजिशनिंग सिग्नल पर निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन अगर दुश्मन इन सिग्नलों को जाम कर दे, तो हथियारों की सटीकता प्रभावित हो सकती है। इसी चुनौती से निपटने के लिए अमेरिका ऐसी तकनीक पर काम कर रहा है, जो एक तरफ जीपीएस सिग्नल बाधित कर सकती है और दूसरी तरफ अमेरिकी सेना को जीपीएस के बिना भी अभियान चलाने के लिए तैयार करने में मदद करती है।
क्या है ‘हैमर ऑफ द गॉड्स’?
जुलाई 2026 में अमेरिकी आर्मी, नेवी और स्पेस फोर्स ने दक्षिणी कैलिफोर्निया के समुद्री क्षेत्र में ‘हैमर ऑफ द गॉड्स’ नामक सिस्टम का परीक्षण किया। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, यह लो-सिग्नेचर एमिटर है, जिसे एक क्षेत्र में पोजिशनिंग, नेविगेशन और टाइमिंग यानी PNT सिग्नल बाधित करने के लिए तैयार किया गया है। यह पारंपरिक मिसाइल या बम जैसा हथियार नहीं है। यह इलेक्ट्रॉनिक तरंगों के जरिए सिग्नलों में हस्तक्षेप करता है। इसके जमीनी संस्करणों का इस्तेमाल पिछले दो वर्षों से सैन्य अभ्यासों में किया जा रहा था, जबकि समुद्र में पहली बार इसका परीक्षण किया गया। इस दौरान सिस्टम को जहाज से लॉन्च करने, संचालित करने और वापस लाने की प्रक्रिया भी आजमाई गई। स्पेस फोर्सेज पैसिफिक के लेफ्टिनेंट कर्नल डैरिन हॉल के मुताबिक, PNT आधुनिक सैन्य अभियानों की बुनियाद है। इसके बाधित होने से लंबी दूरी की आर्टिलरी, गाइडेड मिसाइलों और क्रूज हथियारों की सटीकता प्रभावित हो सकती है। अमेरिका के लिए चुनौती यह है कि वह अपने विरोधियों के नेविगेशन सिस्टम को बाधित करने की क्षमता विकसित करने के साथ खुद भी ऐसे हालात में काम कर सके।
जैमर के बीच क्वांटम तकनीक पर क्यों बढ़ा जोर?
GPS सिग्नल को जाम करने की क्षमता रूस और चीन जैसे देशों के लिए भी महत्वपूर्ण सैन्य उपकरण बन चुकी है। रूस-यूक्रेन युद्ध और बाल्टिक सागर क्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग की घटनाओं ने दिखाया है कि सैटेलाइट नेविगेशन पर निर्भरता सैन्य अभियानों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। ऐसे में क्वांटम सेंसिंग और उन्नत इनर्शियल नेविगेशन को संभावित विकल्पों के रूप में देखा जा रहा है। एटॉमिक क्लॉक सैटेलाइट सिग्नल के बिना भी समय का बेहद सटीक हिसाब रखने में मदद करती हैं। मैग्नेटोमीटर पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में बदलाव माप सकते हैं, जबकि कोल्ड-एटम एक्सेलेरोमीटर गति और त्वरण को ट्रैक कर सकते हैं। इन तकनीकों को दूसरे सेंसरों के साथ मिलाकर इस्तेमाल करने से जीपीएस बाधित होने पर भी नेविगेशन जारी रखने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इन तकनीकों की अपनी सीमाएं हैं। चुंबकीय क्षेत्र के आधार पर स्थान का पता लगाने के लिए विस्तृत और विश्वसनीय मैपिंग जरूरी होती है, जबकि इनर्शियल सिस्टम में समय के साथ माप की त्रुटियां बढ़ सकती हैं। इसलिए क्वांटम तकनीक को जीपीएस का पूरी तरह तैयार विकल्प मानना अभी जल्दबाजी होगी।
चिप आधारित एटॉमिक क्लॉक से उम्मीदें
अमेरिका में जीपीएस से स्वतंत्र नेविगेशन के लिए कई स्तरों पर काम चल रहा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, अमेरिकी वायुसेना ने सी-17 विमान पर क्वांटम सेंसिंग से जुड़ी तकनीक का परीक्षण किया है। क्यू-सीटीआरएल कंपनी ने भी जीपीएस बंद होने की स्थिति में सैन्य इनर्शियल सिस्टम की तुलना में 50 गुना बेहतर सटीकता का दावा किया है। ऐसे दावों का वास्तविक सैन्य परिस्थितियों में प्रदर्शन और स्वतंत्र परीक्षण अहम होंगे। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्टैंडर्ड्स एंड टेक्नोलॉजी (NIST) की चिप आधारित एटॉमिक क्लॉक पर हुई प्रगति भी इस दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। छोटे आकार की ऐसी घड़ियां भविष्य में ड्रोन, वाहनों और पनडुब्बियों जैसे प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल की जा सकती हैं। इससे उच्च सटीकता वाली टाइमिंग तकनीक को बड़े उपकरणों से छोटे सिस्टम तक पहुंचाना आसान हो सकता है। कुल मिलाकर, ‘हैमर ऑफ द गॉड्स’ जैसे इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग सिस्टम और क्वांटम नेविगेशन पर शोध आधुनिक युद्ध की दो जुड़ी हुई चुनौतियों को सामने लाते हैं। एक तरफ दुश्मन के सैटेलाइट सिग्नल बाधित करने की क्षमता है, तो दूसरी तरफ अपने हथियारों और सैनिकों को ऐसे वातावरण में प्रभावी बनाए रखना। अमेरिका, चीन और रूस के साथ भारत जैसे देशों के लिए भी स्वदेशी और भरोसेमंद नेविगेशन तकनीक विकसित करना भविष्य की सैन्य तैयारी का अहम हिस्सा बन सकता है।
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