दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग से जुड़े 700 करोड़ रुपये के बहुचर्चित मेडिकल उपकरण और दवा खरीद घोटाले के मुख्य आरोपी राजीव कुमार रंगीला को भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) ने गिरफ्तार कर लिया है। महीनों से फरार चल रहे रंगीला ने बृहस्पतिवार को एसीबी के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। शुक्रवार को उसे अदालत में पेश किया गया, जहाँ से जांच एजेंसी ने मामले की तह तक पहुँचने के लिए उसकी चार दिनों की रिमांड हासिल कर ली है।
अमेरिका फरारी से लेकर संपत्ति जब्ती तक का दबाव
सेंट्रल प्रोक्योरमेंट एजेंसी (सीपीए) और स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय से जुड़े इस मामले में मुकदमा दर्ज होने के बाद से ही आरोपी लगातार ठिकाने बदल रहा था। जून महीने में मामले के पहले आरोपी की गिरफ्तारी के तुरंत बाद राजीव रंगीला अमेरिका भाग गया था। एसीबी द्वारा लुक आउट सर्कुलर जारी करने और दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तराखंड में छापेमारी के बावजूद जब वह पेश नहीं हुआ, तो अदालत ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया। एजेंसी अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में उसकी चल-अचल संपत्तियों को जब्त करने की विधिक तैयारी कर रही थी, जिसके दबाव में उसने सरेंडर किया।
नौकरों और चाय विक्रेताओं के नाम पर फर्जी कंपनियां
एसीबी की गहन जांच में खुलासा हुआ है कि पूर्वी दिल्ली निवासी राजीव रंगीला एक बड़ा फार्मा सप्लायर है और उसने वर्ष 2014 में हरियाणा के करनाल से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर विधानसभा चुनाव भी लड़ा था। उसने जालसाजी के तहत एफ मेड डिवाइसेज, टेक्नोक्रेट्स, राजश्री, आशि सर्जिकल एंड फार्मास्यूटिकल्स और एम साहिब एंड संस जैसी कई फर्जी कंपनियां खड़ी कर रखी थीं। इन शेल कंपनियों का कागजी मालिक उसने अपने घरेलू नौकरों और चाय बेचने वालों को बना रखा था, जबकि असल बागडोर खुद संभालता था।
टेंडर सेटिंग और नकद कमीशन का खेल
आरोपी निर्माताओं के साथ मिलीभगत कर चिकित्सा उपकरणों की कीमतें पहले से तय कर लेता था और इसके बदले भारी नकद कमीशन वसूलता था। टेंडर प्रक्रियाओं में अपनी ही फर्जी फर्मों को लाभ पहुँचाने के लिए शर्तों को मनमाने ढंग से तय किया जाता था। इन दस्तावेजों को सीपीए के तत्कालीन हेड ऑफ ऑफिस डॉ. विनोद कुमार रंगा के जरिए टेंडर कमेटी में भिजवाया जाता था। डॉ. रंगा को एसीबी ने 18 जून को सबसे पहले गिरफ्तार किया था।
गायब फाइलों और मददगारों का खुलेगा राज
एसीबी को दिल्ली, हरियाणा और उत्तराखंड में राजीव रंगीला की कई संपत्तियों का सुराग मिला है। रिमांड अवधि के दौरान जांच अधिकारी फर्जी कंपनियों के गठन में मदद करने वाले उसके सहयोगियों और स्वास्थ्य विभाग से रहस्यमय तरीके से गायब हुई महत्वपूर्ण सरकारी फाइलों के संबंध में कड़ाई से पूछताछ करेंगे।
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