चीन सीमा से लगे इलाकों में हाल ही में आई तबाही के बाद नेपाल सरकार ने हिमालय में मंडराते जलप्रलय के खतरे को टालने के लिए एक महा-अभियान की रूपरेखा तैयार की है। लगभग 415 करोड़ रुपये की लागत वाली इस योजना का मुख्य उद्देश्य 13,280 से 18,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित चार बेहद खतरनाक बर्फीली झीलों के जलस्तर को घटाकर सुरक्षित स्तर पर लाना है। ग्रीनलैंड क्लाइमेट फंड, संयुक्त राष्ट्र और नेपाल सरकार के सहयोग से चलने वाला यह छह वर्षीय प्रोजेक्ट अचानक आने वाली तबाही से नेपाल के साथ-साथ पड़ोसी देश भारत की भी रक्षा करेगा।
18 हजार फीट की जानलेवा ऊंचाई पर ऐसे खाली होगा पानी
वैज्ञानिकों के अनुसार मध्य और पूर्वी नेपाल में मौजूद ठुलागी, लोअर बारुण, लुमडिंग त्शो और होंगू-2 नामक ये चार बर्फीली झीलें ढीली मिट्टी व बर्फ के सहारे टिकी हुई हैं। विशेषज्ञ सुभाष तुलाधर और संजीब बराल का कहना है कि अत्यधिक ऊंचाई, शून्य से नीचे तापमान, ऑक्सीजन की कमी और हिमस्खलन के खतरे के बीच पक्की नियंत्रित नहरें व रेगुलेटेड गेट बनाए जाएंगे। झीलों का जलस्तर केवल 3 मीटर (10 फीट) घटाने से ही प्राकृतिक बांध फटने की आशंका 70 से 80 प्रतिशत तक कम हो जाएगी। इसके साथ ही झीलों पर 24 घंटे निगरानी रखने के लिए हाई-टेक सेंसर और अर्ली वार्निंग सिस्टम भी बिछाया जाएगा।
बिहार और उत्तर प्रदेश को अचानक आने वाली बाढ़ से मिलेगी राहत
नेपाल के इस साहसिक मिशन का सीधा लाभ भारत के मैदानी इलाकों को मिलेगा। ये खतरनाक झीलें जिन नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में आती हैं, उनका पानी आगे जाकर भारत की कोशी और गंडक जैसी प्रमुख नदियों में मिलता है। झीलों का पानी नियंत्रित होने से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में अचानक आने वाली विनाशकारी बाढ़ का संकट हमेशा के लिए टल जाएगा।
रियल-टाइम डेटा शेयरिंग और अरबों के इंफ्रास्ट्रक्चर को सुरक्षा कवच
इस परियोजना के तहत झीलों में होने वाली हलचल का रियल-टाइम डेटा सीधे भारतीय मौसम विभाग और केंद्रीय जल आयोग के साथ साझा किया जाएगा। इससे किसी भी संभावित आपात स्थिति में भारतीय प्रशासन को निचले इलाकों को खाली कराने के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा। इसके अतिरिक्त, भारत-नेपाल सीमा पर स्थित बहुमूल्य बैराज, जलविद्युत परियोजनाएं, पुल और सड़कें भी पानी के प्रचंड वेग से तबाह होने से बच जाएंगी।
नेपाल के पास पहले से मौजूद है सफलता का अनुभव
ग्लोबल वार्मिंग के कारण पिघलते ग्लेशियरों से बने इस ‘टाइम बम’ को निष्क्रिय करना बेहद कठिन है, लेकिन नेपाल पहले भी यह कारनामा कर चुका है। वर्ष 2000 में त्शो रोल्पा झील और करीब दस वर्ष पूर्व माउंट एवरेस्ट के पास स्थित इम्जा झील का जलस्तर इसी तकनीक से तीन-तीन मीटर कम किया गया था। इस पुराने अनुभव के बल पर नेपाल एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में सुरक्षा की नई मिसाल कायम करने जा रहा है।
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