अगर आप WhatsApp या Telegram का इस्तेमाल करते समय फोन से SIM कार्ड निकाल देते हैं, या अपने अकाउंट को दूसरे फोन और लैपटॉप पर चलाते हैं, तो आने वाले समय में आपको कुछ बदलावों का सामना करना पड़ सकता है। केंद्र सरकार ने मैसेजिंग प्लेटफॉर्म को SIM बाइंडिंग से जुड़े निर्देशों का पालन करने के लिए 31 दिसंबर 2026 तक का समय दिया है। इन निर्देशों का उद्देश्य डिजिटल धोखाधड़ी पर लगाम लगाना और मोबाइल नंबरों के दुरुपयोग को रोकना है। हालांकि, नए नियमों के वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेंगे कि संबंधित ऐप इन्हें किस तरह लागू करते हैं।
क्या है SIM बाइंडिंग का नया नियम?
दूरसंचार विभाग (DoT) ने मैसेजिंग ऐप्स के लिए SIM बाइंडिंग से जुड़े निर्देश जारी किए हैं। इसके तहत ऐप पर रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर से जुड़ी सक्रिय SIM और ऐप के इस्तेमाल के बीच संबंध बनाए रखने की व्यवस्था लागू की जानी है। आसान भाषा में समझें तो केवल एक बार OTP के जरिए मोबाइल नंबर वेरिफाई करके SIM निकाल देने के बाद भी अकाउंट इस्तेमाल करने की मौजूदा सुविधा पर असर पड़ सकता है। यदि रजिस्टर्ड नंबर की SIM डिवाइस में मौजूद नहीं है या निष्क्रिय हो जाती है, तो ऐप की कुछ सेवाओं तक पहुंच प्रभावित हो सकती है। सरकार ने इस व्यवस्था को लागू करने के लिए पहले मार्च 2026 तक की समयसीमा रखी थी। बाद में तकनीकी चुनौतियों और कंपनियों की मांग के चलते इसे बढ़ाकर 31 दिसंबर 2026 कर दिया गया। इस समयसीमा के बाद यानी 1 जनवरी 2027 से नए निर्देशों के प्रभावी होने की तैयारी है।
इन ऐप्स पर पड़ सकता है असर
SIM बाइंडिंग से जुड़े निर्देशों के दायरे में कई लोकप्रिय मैसेजिंग और कम्युनिकेशन ऐप्स शामिल हैं। इनमें WhatsApp, Telegram, Signal, Snapchat, ShareChat और JioChat जैसे प्लेटफॉर्म के नाम बताए गए हैं। इस बदलाव को लेकर उन यूजर्स के मन में सवाल उठ सकते हैं, जो एक ही अकाउंट को अलग-अलग डिवाइस पर इस्तेमाल करते हैं। खासकर फोन से SIM निकालकर Wi-Fi के जरिए मैसेजिंग ऐप चलाने वाले लोगों को संबंधित ऐप के नियमों और निर्देशों पर ध्यान देना होगा।
साइबर फ्रॉड रोकने के लिए क्यों उठाया गया कदम?
सरकार का उद्देश्य साइबर अपराधियों द्वारा भारतीय मोबाइल नंबरों के कथित दुरुपयोग को रोकना है। आशंका है कि कुछ अपराधी मोबाइल नंबर से अकाउंट वेरिफाई करने के बाद SIM हटाकर भी उसका इस्तेमाल जारी रखते हैं। ऐसे अकाउंट के जरिए फर्जी संदेश, फिशिंग लिंक, निवेश के नाम पर ठगी और डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर अपराधों को अंजाम दिया जा सकता है। SIM बाइंडिंग से अकाउंट और सक्रिय मोबाइल नंबर के बीच संबंध बनाए रखने में मदद मिल सकती है। इससे जांच एजेंसियों को संदिग्ध गतिविधियों की पड़ताल करने और धोखाधड़ी में इस्तेमाल किए गए नंबरों का पता लगाने में सहूलियत हो सकती है। फिलहाल यूजर्स को घबराने के बजाय अपने रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर की सक्रियता बनाए रखनी चाहिए और संबंधित ऐप्स की ओर से जारी होने वाले आधिकारिक निर्देशों पर नजर रखनी चाहिए। नए नियमों का अंतिम असर उनके लागू होने के तरीके पर निर्भर करेगा।
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