Monthly Shivratri: अक्टूबर 2026 की मासिक शिवरात्रि आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार, चतुर्दशी तिथि 8 अक्टूबर की रात 10:15 बजे शुरू होगी और 9 अक्टूबर की रात 9:35 बजे तक रहेगी। शिवरात्रि की तिथि निशिता मुहूर्त के आधार पर तय होती है, इसलिए व्रत 8 अक्टूबर, गुरुवार को रखना उचित रहेगा।
निशिता मुहूर्त में होगी विशेष पूजा
8 अक्टूबर को शिव पूजा के लिए निशिता मुहूर्त रात 11:44 बजे से देर रात 12:33 बजे तक रहेगा। इसी अवधि में मंत्र साधना करना विशेष माना जाता है। हालांकि, भगवान शिव का जलाभिषेक और सामान्य पूजा दिन में ब्रह्म मुहूर्त से भी की जा सकती है। शिव पूजा में राहुकाल और भद्रा आदि का दोष नहीं लिया जाता।
ब्रह्म और अभिजीत मुहूर्त भी जानें
इस दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:39 बजे से 5:28 बजे तक रहेगा। वहीं अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:45 बजे से दोपहर 12:32 बजे तक रहेगा। श्रद्धालु अपनी सुविधा के अनुसार इन समयों में भी पूजा-अर्चना कर सकते हैं।
9 अक्टूबर को होगा चतुर्दशी श्राद्ध
मासिक शिवरात्रि 8 अक्टूबर को होने के बावजूद चतुर्दशी श्राद्ध 9 अक्टूबर को किया जाएगा। इसकी मुख्य वजह चतुर्दशी की उदयातिथि है। 9 अक्टूबर को सूर्योदय सुबह 6:18 बजे होगा और उस समय चतुर्दशी तिथि मौजूद रहेगी। वहीं, श्राद्ध और तर्पण के लिए दिन के समय मिलने वाले कुतुप और रौहिण मुहूर्त को महत्व दिया जाता है।
श्राद्ध के लिए ये हैं मुहूर्त
9 अक्टूबर को चतुर्दशी श्राद्ध के लिए कुतुप मुहूर्त सुबह 11:45 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक रहेगा। इसके बाद रौहिण मुहूर्त दोपहर 12:31 बजे से 1:18 बजे तक होगा। इन्हीं मुहूर्तों में पितरों के लिए तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान, दान, ब्राह्मण भोज और पंचबलि कर्म किए जा सकते हैं। अपराह्न काल दोपहर 1:18 बजे से 3:38 बजे तक रहेगा।
चतुर्दशी श्राद्ध का महत्व
चतुर्दशी श्राद्ध उन पितरों के लिए किया जाता है, जिनका निधन किसी भी महीने की चतुर्दशी तिथि को हुआ हो। इसके अलावा अकाल मृत्यु प्राप्त करने वाले पितरों का श्राद्ध भी चतुर्दशी तिथि पर करने की परंपरा है। चतुर्दशी के प्रतिनिधि देव भगवान शिव माने जाते हैं और मान्यता है कि उनकी कृपा से अकाल मृत्यु वाले पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
अकाल मृत्यु वालों के लिए विशेष दिन
मान्यता के अनुसार, जो लोग असाध्य रोग, दुर्घटना, आत्महत्या या अन्य कारणों से अपनी निर्धारित आयु पूरी नहीं कर पाते, उन्हें अकाल मृत्यु प्राप्त होती है। ऐसे पितरों के लिए चतुर्दशी श्राद्ध का विशेष महत्व बताया गया है।
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