उत्तराखंड की प्रसिद्ध नंदा देवी राजजात यात्रा 12 साल के अंतराल के बाद 2026 में आयोजित होने जा रही है। चमोली जिले के ऊंचे हिमालयी इलाकों से गुजरने वाली इस धार्मिक यात्रा को एशिया की सबसे लंबी धार्मिक यात्राओं में गिना जाता है और इसे ‘हिमालयी महाकुंभ’ भी कहा जाता है। करीब 280 किलोमीटर का यह पैदल सफर 20 पड़ावों में पूरा होता है, जिनमें पांच पड़ाव बेहद दुर्गम और निर्जन क्षेत्र में आते हैं।
नौटी से होमकुंड तक 20 दिन का कठिन सफर
राजजात की शुरुआत चमोली के नौटी स्थित नंदा देवी मंदिर से होती है। करीब 20 दिनों तक चलने वाली यात्रा समुद्र तल से लगभग 14,600 फीट की ऊंचाई वाले होमकुंड तक पहुंचकर संपन्न होती है। पहाड़ी रास्तों, ऊंचाई और दुर्गम पड़ावों के कारण यह यात्रा धार्मिक आस्था के साथ कठिन भौगोलिक परिस्थितियों से जुड़ी मानी जाती है।
इस यात्रा का सबसे खास प्रतीक चौसिंग्या खाडू यानी चार सींग वाला मेढ़ा है। परंपरा के अनुसार यही राजजात का पथ प्रदर्शक होता है और नौटी से होमकुंड तक यात्रा की अगुआई करता है। यात्रा पूरी होने के बाद चौसिंग्या खाडू को देवी नंदा के साथ कैलास की ओर विदा किया जाता है।
नंदा को कैलास भेजने से जुड़ी है प्राचीन मान्यता
लोक मान्यता के अनुसार हिमवंत और मैणा की सात पुत्रियों में सबसे छोटी नंदा का विवाह कैलासवासी भगवान शिव से हुआ था। कहा जाता है कि विवाह के बाद 12 वर्षों तक जब पिता हिमवंत ने नंदा की सुध नहीं ली तो उन्होंने अपने माता-पिता को पुकारा। उनके आंसू धरती पर गिरे और इससे पिता के राज्य में उथल-पुथल मच गई। परेशान हिमवंत महर्षि नारद के पास पहुंचे। मान्यता है कि नारद ने उन्हें हेमंत ऋतु में उपहार लेकर नंदा को मनाने की सलाह दी। इसी परंपरा से वार्षिक जात नंदा कुरुड़ के आयोजन की मान्यता जुड़ी है। राजजात में भी नंदा को उनके मायके से कैलास की ओर विदा करने की परंपरा निभाई जाती है।
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