Solar Superflare: सूरज को अब तक जीवन का आधार माना जाता रहा है, लेकिन उसकी सतह पर होने वाली बेहद शक्तिशाली गतिविधियां आधुनिक तकनीक के लिए बड़ा खतरा बन सकती हैं। जर्मनी के मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर सोलर सिस्टम रिसर्च के वैज्ञानिकों की नई स्टडी में सामने आया है कि हमारा सूरज भी सिद्धांत रूप से सुपरफ्लेयर पैदा कर सकता है। ऐसे विस्फोटों में ऊर्जा खरबों हाइड्रोजन बमों से भी ज्यादा हो सकती है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने अभी तक सूरज पर ऐसा सुपरफ्लेयर होते हुए सामने से नहीं देखा है।
1947 का विशाल सनस्पॉट बना अध्ययन का आधार
शोधकर्ताओं की नजर अप्रैल 1947 में दिखाई दिए एक बेहद बड़े सनस्पॉट पर गई। यह सनस्पॉट सूरज की दिखाई देने वाली डिस्क के करीब 0.6 प्रतिशत हिस्से में फैला था और इसका व्यास पृथ्वी से लगभग 40 गुना था। अध्ययन के अनुसार इतना विशाल और जटिल एक्टिव रीजन दुर्लभ परिस्थितियों में सुपरफ्लेयर के लिए पर्याप्त चुंबकीय ऊर्जा जमा कर सकता है। बड़ी बात यह है कि 1947 में ऐसा सुपरफ्लेयर हुआ नहीं था।
300 शक्तिशाली फ्लेयर्स का किया विश्लेषण
वैज्ञानिकों ने NASA के Solar Dynamics Observatory से मिले 2010 से 2016 के आंकड़ों का इस्तेमाल किया। इस दौरान दर्ज करीब 300 सबसे शक्तिशाली सोलर फ्लेयर्स को उनके एक्टिव रीजन के आकार के साथ जोड़ा गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि एक्टिव रीजन जितना बड़ा और जटिल होता है, उससे निकलने वाली फ्लेयर ऊर्जा की संभावित सीमा भी उतनी ही बढ़ती है। इसके बाद इसी संबंध को ऐतिहासिक रूप से दर्ज बड़े सनस्पॉट पर लागू किया गया।
मैग्नेटिक फील्ड में छिपी है असली ताकत
सूरज के सनस्पॉट ऐसे क्षेत्र होते हैं जहां चुंबकीय क्षेत्र बेहद मजबूत और जटिल हो सकता है। जब चुंबकीय क्षेत्र में बदलाव और पुनर्संयोजन होता है, तो भारी मात्रा में ऊर्जा विकिरण और सौर कणों के रूप में अंतरिक्ष में निकल सकती है। इसी वजह से बड़े एक्टिव रीजन को ज्यादा शक्तिशाली फ्लेयर्स के संभावित स्रोत के तौर पर देखा जाता है। नई स्टडी ने सबसे बड़े ऐतिहासिक सनस्पॉट के आधार पर सूरज की अधिकतम संभावित फ्लेयर ऊर्जा का अनुमान लगाया है।
पेड़ों के छल्लों में मिले पुराने सौर तूफानों के संकेत
वैज्ञानिकों को पृथ्वी के प्राकृतिक रिकॉर्ड में भी अत्यधिक सौर गतिविधि के संकेत मिले हैं। पुराने पेड़ों के छल्लों और बर्फ की परतों में रेडियोधर्मी आइसोटोप, खासकर कार्बन-14, में अचानक बढ़ोतरी अतीत में आए अत्यधिक ऊर्जावान सौर-कण घटनाओं की ओर इशारा करती है। हालांकि, शोधकर्ताओं के मुताबिक इन घटनाओं को सीधे सुपरफ्लेयर से जोड़ना अभी निश्चित नहीं है।
धरती पर इंसानों से ज्यादा तकनीक को खतरा
सूरज से आने वाले बड़े सौर तूफानों के प्रभाव से पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र और वायुमंडल जमीन पर मौजूद लोगों को काफी हद तक सुरक्षा देते हैं। लेकिन अंतरिक्ष और तकनीकी ढांचे पर असर गंभीर हो सकता है। शक्तिशाली सौर गतिविधि से सैटेलाइट्स को नुकसान, रेडियो संचार में बाधा और बिजली व्यवस्था में समस्याएं पैदा हो सकती हैं। 1859 के Carrington Event के दौरान ही टेलीग्राफ नेटवर्क पर बड़ा असर पड़ा था, जबकि आज दुनिया कहीं ज्यादा सैटेलाइट और इलेक्ट्रॉनिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर है।
क्या सूरज सच में सुपरफ्लेयर छोड़ सकता है?
नई रिसर्च का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि सूरज में सुपरफ्लेयर पैदा करने की क्षमता को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिकों ने 1947 जैसे विशाल सनस्पॉट के आधार पर पाया कि दुर्लभ परिस्थितियों में ऐसे क्षेत्र अत्यधिक शक्तिशाली फ्लेयर की शुरुआत कर सकते हैं। लेकिन ऐसा विस्फोट वास्तव में सूरज पर कभी हुआ है या भविष्य में कब होगा, यह अभी भी वैज्ञानिकों के लिए अनिश्चित सवाल है।
Read More:
CM योगी की PM मोदी से डेढ़ घंटे की मुलाकात, 24 घंटे में दूसरी बड़ी बैठक, UP चुनाव से पहले बढ़ी हलचल

