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अपने अधिकारों के आधार पर वंदे मातरम् गाने से इनकार करना अपराध नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने दिया बयान…

सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम्(Vande Mataram) को लेकर चल रही सुनवाई में कहा कि अगर कोई व्यक्ति अपनी अंतरात्मा, मौलिक अधिकारों या धार्मिक स्वतंत्रता के आधार पर राष्ट्रगीत गाने से इनकार करता है, तो केवल इस वजह से उसे आपराधिक सजा नहीं दी जानी चाहिए। अदालत ने इस संदर्भ में 1986 के बिजो इमैनुएल बनाम केरल सरकार मामले का भी उल्लेख किया। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहने वाले लेकिन उसे न गाने वाले बच्चों को संरक्षण दिया था।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की भूमिका

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि लोकतांत्रिक सरकार यह तय कर सकती है कि राष्ट्रीय गीत क्या होगा और उसके कितने हिस्से आधिकारिक रूप से गाए जाएंगे।

हालांकि, यदि कोई व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में मिले अधिकारों या अपनी अंतरात्मा के आधार पर इसे गाने से इनकार करता है तो उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का सवाल अलग तरीके से देखा जाना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस सुनवाई में वह यह तय नहीं कर रही कि राष्ट्रीय गीत क्या होना चाहिए। पीठ ने यह भी कहा कि वंदे मातरम् से जुड़ी राष्ट्रीय भावनाओं पर वह कोई सवाल नहीं उठा रही है।

टीएम कृष्णा की याचिका में क्या चुनौती दी गई है?

कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध गायक टीएम कृष्णा ने 1971 के प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट में 2026 में किए गए संशोधन की धारा 3 को चुनौती दी है। संशोधित प्रावधान के तहत राष्ट्रगान या राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर रोकने अथवा किसी कार्यक्रम में बाधा डालने पर तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।

याचिका में गृह मंत्रालय के 28 जनवरी और 9 जुलाई के निर्देशों को भी चुनौती दी गई है, जिनमें वंदे मातरम् के सभी छह अंतरे गाने से जुड़े निर्देश शामिल हैं।

याचिकाकर्ता ने दिया तर्क

याचिकाकर्ता का तर्क है कि कानून में ‘राष्ट्रीय गीत’ की स्पष्ट परिभाषा नहीं है और सभी छह अंतरों को अनिवार्य करने से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अंतरात्मा की स्वतंत्रता, समानता और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक सवाल पैदा होते हैं।

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ वकील एस. मुरलीधर के बीच बहस भी हुई। हालांकि, पीठ ने उस हिस्से को रिकॉर्ड में शामिल करने से इनकार कर दिया और कहा कि वह इस विवाद पर कोई संज्ञान नहीं ले रही है।

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