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भाभी ‘डायन’ या ‘देवी’? यामी गौतम की कॉमेडी ने जीता दिल, लेकिन फिल्म की कहानी में कहां हुई चूक?

हिंदी सिनेमा में इन दिनों लोककथाओं और पौराणिक कहानियों पर आधारित फिल्मों का चलन बढ़ रहा है। इसी कड़ी में यामी गौतम(Yami Gautam) की फिल्म ‘नई नवेली’ दर्शकों के सामने आई है। फिल्म में पारिवारिक ड्रामा, कॉमेडी, रहस्य और पौराणिक संदर्भों का मिश्रण देखने को मिलता है। हालांकि, फिल्म की शुरुआत जितनी मनोरंजक है आगे बढ़ने पर कहानी उतनी ही उलझती नजर आती है। फिल्म की कहानी मेरठ के अवस्थी परिवार से शुरू होती है।

परिवार के बड़े बेटे राजा अवस्थी की शादी मोहिनी (यामी गौतम) से होती है। लेकिन घर में जल्द ही अजीब घटनाएं होने लगती हैं। राजा का छोटा भाई बंटू अपनी भाभी मोहिनी पर शक करने लगता है। उसे लगता है कि मोहिनी कोई साधारण महिला नहीं, बल्कि डायन है। बंटू परिवार के बाकी सदस्यों को भी अपनी बात पर यकीन दिलाने की कोशिश करता है। कहानी में मंदिर, श्मशान और तंत्र-मंत्र जैसे प्रसंग आते हैं। बाद में मोहिनी की असलियत सामने आती है और कहानी रामायण काल से जुड़े घटनाक्रम की ओर मुड़ जाती है।

पहला हाफ मजेदार, दूसरा हिस्सा कमजोर

फिल्म का शुरुआती भाग हंसी-मजाक और पारिवारिक नोकझोंक से भरपूर है। बंटू की हरकतें और परिवार के सदस्यों के बीच होने वाली बातचीत दर्शकों का मनोरंजन करती हैं। लेकिन इंटरवल के बाद कहानी में पौराणिक प्रसंगों और कई अप्रत्याशित मोड़ों को जोड़ने की कोशिश कुछ असहज लगती है। इससे फिल्म की गति और कहानी का जुड़ाव प्रभावित होता है।

कैसा है कलाकारों का अभिनय ?

यामी गौतम मोहिनी के किरदार में सहज नजर आती हैं। वहीं, बंटू की भूमिका में अनुराग ठाकुर अपनी कॉमिक टाइमिंग से खास प्रभाव छोड़ते हैं। आदिनाथ कोठारे, सुष्मिता मुखर्जी, सुनीता राजवर और मीता वशिष्ठ ने भी अपने किरदारों के साथ न्याय किया है। आदित्य कुलश्रेष्ठ के संवाद भी फिल्म के हास्य पक्ष को मजबूत बनाते हैं।

निर्देशन और लेखन में कहां हुई चूक?

निर्देशक बालाजी मोहन पहले हिस्से में कॉमेडी और पारिवारिक ड्रामे का अच्छा तालमेल बनाते हैं। हालांकि, दूसरे भाग में कहानी को संभालना मुश्किल हो जाता है। लेखक हिमांशु शर्मा की कल्पना दिलचस्प है लेकिन जरूरत से ज्यादा ट्विस्ट और पौराणिक संदर्भ कथानक को उलझा देते हैं।

‘नई नवेली’ का पहला हिस्सा मनोरंजन करता है और कलाकारों का अभिनय भी फिल्म को सहारा देता है। लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले और बिखरी हुई कहानी इसके प्रभाव को कम कर देते हैं। अगर फिल्म कॉमेडी और पारिवारिक हॉरर के दायरे में रहती, तो इसका असर ज्यादा मजबूत हो सकता था।

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