अंतरराष्ट्रीय शोध और विश्लेषण संस्था ‘ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अगले महीने यानी नवंबर में ईंधन (फ्यूल) की कीमतों में मामूली इजाफा देखने को मिल सकता है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए संस्था की प्रमुख अर्थशास्त्री एलेक्जेंड्रा हरमन प्रसाद ने बताया कि अगले साल देश के कई राज्यों में होने वाले महत्वपूर्ण चुनावों का दौर शुरू होने से ठीक पहले सरकार या तेल कंपनियों के पास पेट्रोल पंपों पर कीमतें बढ़ाने का यह एक सीमित मौका हो सकता है।
आगामी चुनावों और राजनीतिक समीकरणों का असर
रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि अगले साल देश के 7 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें से पांच प्रमुख राज्यों (जिनमें उत्तर प्रदेश और पंजाब भी शामिल हैं) में मार्च से मई के बीच मतदान होना तय है। ऐसे में, चुनाव प्रचार पूरी तरह से परवान चढ़ने से पहले ही ईंधन के दामों में फेरबदल किए जाने की पूरी संभावना है, जो आगे चलकर एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बन सकता है।
खुदरा महंगाई दर पर पड़ेगा सीधा असर
विश्लेषकों का अनुमान है कि यह संभावित बढ़ोतरी बीते मई महीने में मिडिल ईस्ट के तनाव के कारण हुई मूल्य वृद्धि की लगभग आधी होगी। इसके बावजूद, इस मामूली बढ़ोतरी से भी खुदरा महंगाई दर के आंकड़े प्रभावित होंगे। रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर से दिसंबर तिमाही में महंगाई दर बढ़कर 6.2 फीसदी और साल 2027 के शुरुआती तीन महीनों में 6.5 फीसदी तक पहुंच सकती है, जो कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 2 से 6 फीसदी के तय लक्ष्य से काफी ऊपर है।
आरबीआई के अनुमान और रेपो रेट बढ़ने के आसार
इस महीने की शुरुआत में जारी आरबीआई की मौद्रिक नीति समीक्षा में अक्टूबर-दिसंबर के लिए महंगाई 6% और जनवरी-मार्च के लिए 5.7% रहने का अनुमान जताया गया था। हालांकि, ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स का मानना है कि यदि नवंबर में ईंधन के दाम बढ़ते हैं, तो RBI पर ब्याज दरें (रेपो रेट) बढ़ाने का दबाव और अधिक बढ़ जाएगा। संस्था का अनुमान है कि केंद्रीय बैंक अक्टूबर की तिमाही के बाद दिसंबर और फरवरी की नीतिगत बैठकों में ब्याज दरों में 25 से 50 बेसिस अंकों तक की बढ़ोतरी कर सकता है।
रुपये की स्थिरता और वैश्विक बाजार का दबाव
रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि मुद्रा बाजार में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा किए गए हालिया हस्तक्षेप से रुपये की अस्थिरता को नियंत्रित करने में कुछ हद तक मदद जरूर मिलेगी। हालांकि, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और निरंतर बाहरी फंडिंग के दबाव को देखते हुए केवल सरकारी हस्तक्षेप से मुद्रा की स्थायी स्थिरता की गारंटी मिलना मुश्किल है, जिससे आने वाले दिनों में आम आदमी की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।