Supreme Court on Medicine Price: कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की ऊंची कीमतों और रिटेल स्तर पर भारी मार्जिन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि अगर किसी दवा की कीमत रिटेलर को 2,700 रुपये पड़ती है और उसकी MRP 27,000 रुपये रखी जाती है, तो कीमत में यह 10 गुना अंतर मरीजों से उगाही और दिनदहाड़े डकैती है।
DPCO 2013 को लेकर उठे सवाल
यह टिप्पणी किशन चंद जैन और संजय कुलश्रेष्ठ की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सामने आई। याचिकाओं में ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO), 2013 की कमियों का मुद्दा उठाया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में जरूरी यानी शेड्यूल्ड दवाओं की कीमतें नियंत्रित होती हैं, लेकिन गैर-शेड्यूल्ड दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने में सरकार का प्रभावी नियंत्रण नहीं है।
याचिकाकर्ता ने बताया कीमतों का खेल
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, इसी व्यवस्था का फायदा उठाकर दवा कंपनियां गैर-शेड्यूल्ड दवाओं की MRP काफी ज्यादा तय कर सकती हैं। इससे रिटेलर और निजी अस्पतालों को भी भारी मार्जिन मिलता है। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति पर गंभीर चिंता जताई और केंद्र सरकार से जवाब मांगा। मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को होगी।
‘शुरुआती कीमत पर सरकार का नियंत्रण नहीं’
अपनी याचिका की खुद पैरवी कर रहे किशन चंद जैन ने कहा कि दवा की शुरुआती कीमत तय करने में सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है, जबकि बाद में कीमत बढ़ाने पर सरकार का नियंत्रण रहता है। उनका कहना है कि उत्पादक शुरुआत में ही इतनी ऊंची कीमत तय कर देते हैं कि मरीजों के लिए दवा खरीदना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने बताया कि बाजार में उपलब्ध कुल दवाओं में से केवल 17% ही शेड्यूल्ड ड्रग्स हैं, जिनकी कीमत पर सरकार का पूरा नियंत्रण रहता है।
जीवन रक्षक दवाओं की कीमत पर चिंता
याचिकाकर्ता ने कहा, “जीवन रक्षक दवाओं की कीमत इतनी ज्यादा रखी गई है कि कई बार मरीज के परिवारों को कई बार घर और गहने तक बेचने पड़ते हैं।” इस पर जस्टिस संदीप मेहता ने सवाल किया कि जब रिटेलर को दवा 2,700 रुपये में मिल रही है, तो लोगों से उसके लिए 27,000 रुपये क्यों लिए जा रहे हैं? उन्होंने यह भी पूछा कि दवा की कीमतों से जुड़ी सरकार की नियामक संस्थाएं इस पर कार्रवाई क्यों नहीं कर रही हैं?
सरकारी योजनाओं पर भी पड़ता है असर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दवाओं की इस तरह ऊंची कीमतों का असर केवल मरीजों तक सीमित नहीं है, बल्कि टैक्स देने वाले लोगों पर भी पड़ता है। जब मरीज आयुष्मान भारत या दूसरी सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत इलाज कराते हैं, तो अस्पताल इन दवाओं की ऊंची MRP के आधार पर सरकार से भुगतान लेते हैं। इससे सरकारी खजाने पर भी फालतू बोझ पड़ सकता है।
केंद्र ने कहा- सरकार गंभीरता से देख रही है
केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने कहा कि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से देख रही है। वहीं, दवा उत्पादकों की संस्था की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि दवा की कीमत में रिटेलर और अस्पताल के स्तर पर भी बड़ा मार्जिन शामिल होता है। उनके अनुसार, ऐसा जरूरी नहीं है कि ऊंची कीमत का पूरा फायदा दवा कंपनी को ही मिले।
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