लद्दाख(Ladakh) में पानी की कमी और सिंचाई की समस्या से निपटने के लिए प्रशासन ने बड़ा कदम उठाया है। लेफ्टिनेंट गवर्नर विनय कुमार सक्सेना के नेतृत्व में केंद्र सरकार को 36 नए चेक डैम के निर्माण के लिए 56 करोड़ रुपये का प्रस्ताव भेजा गया है। यह योजना प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के तहत आगे बढ़ाई जाएगी।
इस पहल का उद्देश्य ग्लेशियर और बर्फ पिघलने से मिलने वाले पानी के साथ-साथ नदियों के बहकर निकल जाने वाले पानी को रोककर उसका उपयोग करना है। यह प्रस्ताव मई में LG विनय कुमार सक्सेना और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल के बीच हुई बैठक के बाद तैयार किया गया। यह योजना लद्दाख की व्यापक जल-सुरक्षा रणनीति का हिस्सा है जिसमें प्रोजेक्ट हिम सरोवर, हिमालयन रॉक चेक डैम, इगू-फे सिंचाई नहर और माहे नहर जैसी परियोजनाएं शामिल हैं।
18,600 एकड़ से ज्यादा जमीन को फायदा
प्रस्ताव के मुताबिक, करगिल में सुरू नदी पर 29 चेक डैम या वियर और लेह में सिंधु नदी पर 7 हिमालयन रॉक चेक डैम बनाए जाने की योजना बनाई गई है। प्रशासन का लक्ष्य इन ढांचों के जरिए 18,600 एकड़ से अधिक सूखी जमीन तक भरोसेमंद सिंचाई सुविधा पहुंचाना है।
वहीं लद्दाख प्रशासन के मुताबिक, पानी को स्थानीय स्तर पर रोकने से किसानों को सिंचाई के लिए अधिक भरोसेमंद स्रोत मिल सकता है। इससे खेती को बढ़ावा देने के साथ पूरे इलाके को जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में भी मदद मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
‘हिम सरोवर’ और रॉक चेक डैम पर भी जोर
यह योजना कोई अकेली पहल नहीं है। इससे पहले भी अप्रैल 2026 में शुरू किया गया प्रोजेक्ट हिम सरोवर बर्फ और ग्लेशियर से मिलने वाले पानी को जलाशयों में संरक्षित करने पर केंद्रित है।
मई महीने में लेह के उपशी में एक रॉक चेक डैम भी शुरू किया गया था। इस ढांचे ने नदी के पानी को रोककर करीब 4 करोड़ लीटर की भंडारण क्षमता वाला क्षेत्र बनाया।
हर घर तक नल का पानी पहुंचाने की तैयारी
जल संरक्षण के साथ पेयजल व्यवस्था पर भी काम हो रहा है। लद्दाख प्रशासन ने जल शक्ति मंत्रालय के साथ MoU पर साइन कर समझौता किया है जिसके तहत जल जीवन मिशन 2.0 के जरिए ग्रामीण घरों तक नल से पानी पहुंचाने का लक्ष्य है। इस समझौते में लद्दाख के लिए पानी के कनेक्शन की लागत का 100 प्रतिशत केंद्रीय फंड को भी शामिल किया गया है।
प्रशासन का जोर इस बात पर है कि लद्दाख में पाई जाने वाली बर्फ, ग्लेशियर और नदी के पानी को बहकर बर्बाद होने देने के बजाय उसे संग्रहित किया जाए ताकि इसका इस्तेमाल खेती और लोगों की जरूरतों के लिए किया जा सके।