नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह(Balendra Shah) ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में जलवायु परिवर्तन और हिमालयी क्षेत्र की बढ़ती चुनौतियों को प्रमुखता से उठाया। 24 सितंबर को दिए अपने संबोधन में उन्होंने नेपाल, भारत और चीन के नेतृत्व में एक हिमालयी जलवायु लचीलापन तंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा।
शाह के प्रस्ताव के तहत तीनों देश जलवायु और आपदा से जुड़ी जानकारियां साझा कर सकते हैं। इसमें सैटेलाइट से मिलने वाले आंकड़ों और तकनीकी विशेषज्ञता का आदान-प्रदान, खतरनाक ग्लेशियल झीलों की निगरानी और साझा प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना शामिल है। उनका कहना था कि किसी आपदा की स्थिति में सीमाओं के पार राहत और बचाव कार्यों के लिए बेहतर तालमेल जरूरी है।
नेपाल की बाढ़ को बताया बड़ी चेतावनी
शाह ने हाल की भोटेकोशी-त्रिशूली बाढ़ का उल्लेख करते हुए इसे केवल नेपाल की स्थानीय त्रासदी नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए चेतावनी बताया। उन्होंने कहा कि ग्लेशियरों के पीछे हटने, पहाड़ी ढलानों के अस्थिर होने और नदियों के बदलते व्यवहार से हिमालयी क्षेत्र में जोखिम बढ़ रहा है।
उन्होंने यह भी बताया कि आपदा के बाद भारत और चीन ने नेपाल को त्वरित सहायता दी। इसके लिए उन्होंने दोनों पड़ोसी देशों के साथ अन्य देशों, संयुक्त राष्ट्र संस्थाओं और मानवीय संगठनों का आभार जताया।
विकसित देशों से अधिक जिम्मेदारी की अपील
नेपाल के प्रधानमंत्री ने जलवायु संकट से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग बढ़ाने की मांग की। उन्होंने कहा कि जिन देशों का ऐतिहासिक रूप से जलवायु संकट में अधिक योगदान रहा है और जिनके पास इससे निपटने की अधिक क्षमता है, उन्हें बड़ी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
शाह ने यह भी कहा कि नेपाल का वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान 0.1 प्रतिशत से भी कम है, फिर भी देश को जलवायु आपदाओं का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। उनके मुताबिक, नेपाल के लिए जलवायु संकट केवल मानवीय समस्या नहीं, बल्कि विकास से जुड़ा गंभीर मुद्दा भी है।