11 सितंबर 2001 को अमेरिका में हुए भीषण आतंकवादी हमलों को 25 साल पूरे हो चुके हैं। इस हमले ने न केवल अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया की भू-राजनीति और सुरक्षा को बदल कर रख दिया। न्यूयॉर्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के गगनचुंबी टावरों से विमानों के टकराने और टावरों के धराशायी होने के दृश्य को दुनिया भर के करोड़ों लोगों ने लाइव टीवी पर स्तब्ध होकर देखा था। पर्ल हार्बर की तर्ज पर हुए इस अप्रत्याशित हमले का कारण कोई पारंपरिक राष्ट्र नहीं, बल्कि अल-कायदा नामक एक उग्रवादी संगठन था, जिसे लंबे समय तक कम आंकने की भारी भूल की गई।
क्या रोके जा सकते थे ये आत्मघाती हमले?
विशेषज्ञों के अनुसार, 9/11 के हमले रोके जा सकते थे। सीआईए (CIA) और एफबीआई (FBI) जैसी प्रमुख अमेरिकी जांच एजेंसियों के बीच आपसी तालमेल की कमी, चेतावनियों को नजरअंदाज करना और अल-कायदा के खतरे को गंभीरता से न लेना इसकी मुख्य वजह बना। हालांकि, इस घटना के बाद खुफिया एजेंसियों के बीच अंतर्राष्ट्रीय सहयोग में भारी सुधार आया, जिसके कारण अधिकांश बड़े आतंकी षड्यंत्रों को शुरुआती चरण में ही नाकाम करने में सफलता मिली। फिर भी, ‘लोन वुल्फ’ यानी अकेले हमलावरों का खतरा आज भी बना हुआ है, जैसा कि दिसंबर 2025 में सिडनी के बॉन्डी बीच पर हुए हमलों में देखा गया। इसके अतिरिक्त, 7 अक्टूबर 2023 को इज़राइल पर हमास के हमले ने यह साबित किया कि खुफिया चेतावनियों को नजरअंदाज करने की नेतृत्व की भूल कितनी भारी पड़ सकती है।
‘वॉर ऑन टेरर’ और उससे उपजी नई मुसीबतें
9/11 के जवाब में अमेरिका द्वारा शुरू की गई ‘ग्लोबल वॉर ऑन टेरर’ (आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक जंग) बिना किसी स्पष्ट रणनीति के दशकों तक चली। इसने अफगानिस्तान और इराक को भीषण युद्ध में धकेल दिया। इराक पर कब्जे के बाद इस्लामिक स्टेट (IS) का जन्म हुआ। सबसे चिंताजनक बात यह रही कि 20 साल के सैन्य अभियान के बावजूद अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी हो गई, जो आज भी क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है।
आतंकवाद की 50 साल पुरानी जड़ें और भविष्य की चुनौती
अल-कायदा की विचारधारा 1950 के दशक में मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड के दमन और सैयद कुतुब की विचारधारा से उपजी थी। 1966 में कुतुब को फांसी दिए जाने के बाद यह सोच सऊदी अरब के वहाबी कट्टरपंथ और ओसामा बिन लादेन के प्रभाव से मिलकर वैश्विक जिहाद में बदल गई। इसी विचारधारा ने 2002 के बाली बम विस्फोटों (जिसमें 2022 लोग मारे गए, जिनमें 88 ऑस्ट्रेलियाई थे) को अंजाम दिया। आज 25 साल बाद भी अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट का प्रभाव अफ्रीका और मध्य एशिया के तनावग्रस्त इलाकों में लगातार फैल रहा है, जो यह दर्शाता है कि सैन्य प्रतिक्रियाओं से उपजे गुस्से ने आतंकवाद के लिए एक नया उपजाऊ मैदान तैयार कर दिया है।
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