दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक हुई। इस बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु ‘इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर’ (INSTC) को जल्द से जल्द हकीकत में बदलना रहा। राष्ट्रपति पुतिन रूस को रेल, सड़क और समुद्री मार्गों के एक मजबूत नेटवर्क के जरिए सीधे भारत से जोड़ने के मास्टरप्लान पर काम कर रहे हैं। इस मेगा प्रोजेक्ट के पूरी तरह शुरू होने से दोनों देशों के बीच व्यापारिक जहाजों और मालगाड़ियों की आवाजाही को एक नई दिशा मिलेगी।
7,200 किलोमीटर लंबा मल्टीमॉडल नेटवर्क
INSTC कोई नया विचार नहीं है; भारत, रूस और ईरान ने वर्ष 2002 में इसके लिए समझौता किया था। यह 7,200 किलोमीटर लंबा एक मल्टीमॉडल नेटवर्क है, जिसमें ट्रेन, सड़क और समुद्री जहाज तीनों शामिल हैं। इसके तहत मुंबई पोर्ट से सामान जहाज द्वारा ईरान के बंदर अब्बास या चाबहार पोर्ट भेजा जाता है, जहां से रेल व सड़क मार्ग के जरिए अजरबैजान या मध्य एशियाई देशों से होते हुए माल रूस के अस्त्रखान और मॉस्को तक पहुंचता है। साल 2014 के ड्राई रन के मुताबिक, पारंपरिक सुएज नहर वाले रास्ते की तुलना में इस रूट से प्रति 15 टन सामान पर करीब 2,500 डॉलर (लगभग ₹2 लाख) की सीधी बचत होती है और यात्रा का समय 40-45 दिनों से घटकर मात्र 18 से 25 दिन रह जाता है।
हिंद महासागर तक सीधी ट्रेन और समुद्री संकट की मजबूरी
रूस के उप-प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन के अनुसार, रूस तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान या पाकिस्तान के रास्तों का इस्तेमाल कर भारत और हिंद महासागर तक सीधी रेलवे कनेक्टिविटी की संभावनाएं तलाश रहा है। लाल सागर, बोस्फोरस और अमेरिका-इजरायल-ईरान तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते सैन्य खतरों को देखते हुए रूस जमीन के रास्ते को प्राथमिकता दे रहा है। रूस के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने पुष्टि की है कि रूस और ब्रिक्स देशों के बीच 90% व्यापार अब राष्ट्रीय मुद्राओं में हो रहा है, जिससे इस व्यापारिक मार्ग को सुगम बनाना अगली बड़ी प्राथमिकता है।
भारत के लिए आर्थिक व रणनीतिक गेमचेंजर
यह प्रोजेक्ट भारत के लिए भी बेहद फायदेमंद है। इससे रूस से आने वाले कच्चे तेल और उर्वरक (खाद) का परिवहन खर्च घटेगा, जिससे देश में ईंधन व खेती की लागत कम होगी। पाकिस्तान द्वारा जमीनी रास्ता न देने के बावजूद, भारत को कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान जैसे संसाधन समृद्ध मध्य एशियाई देशों तक सीधी पहुंच मिलेगी। इसके साथ ही, भारत की दवाएं, कपड़े, चाय और ऑटो पार्ट्स तेजी से यूरोप और रूस पहुंच सकेंगे। यह कॉरिडोर 2018 के अशगाबात समझौते के उद्देश्यों के भी अनुकूल है।
बुनियादी ढांचे और कूटनीति से जुड़ी चुनौतियां
इस परियोजना के सामने कुछ व्यावहारिक दिक्कतें भी हैं। ईरान में रश्त से अस्टारा के बीच गायब रेल लिंक को पूरा करना सबसे बड़ी चुनौती है। इसके अलावा, अलग-अलग देशों में रेलवे पटरियों की चौड़ाई (गेज सिस्टम) भिन्न होने के कारण सीमा पर सामान शिफ्ट करना पड़ता है। साथ ही, विभिन्न देशों के कस्टम नियमों और टैक्स दरों में एकरूपता न होना भी एक बड़ी प्रशासनिक बाधा है। इन चुनौतियों के बावजूद, INSTC दोनों देशों के बीच व्यापार की नई लाइफलाइन बनने की ओर अग्रसर है।
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