Hera Panchami 2026: भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा दुनिया के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक उत्सवों में गिनी जाती है, जिसे देखने के लिए हर साल देश-विदेश से लाखों लोग पुरी पहुंचते हैं। इस भव्य त्यौहार से जुड़ी एक ऐसी रोमांचक कथा भी है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। धार्मिक कथा के अनुसार एक बार माता लक्ष्मी भगवान श्री जगन्नाथ से इतना गुस्सा हो गईं कि उन्होंने उनके रथ नंदीघोष का एक हिस्सा तोड़ दिया।
आपने एकदम सही सुना और पौराणिक मान्यता के अनुसार यह घटना रथ यात्रा के पांचवे दिन हुई थी। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि के दिन हेरा पंचमी मनाई जाती है और इस साल यह 20 जुलाई सोमवार के दिन पड़ रही है। हेरा पंचमी ही वह दिन है जब माता लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ के रथ को तोड़ देती हैं।
भगवान जगन्नाथ से क्यों नाराज हुईं माता लक्ष्मी?
पुरी की प्राचीन परंपरा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर, जिसे उनकी मौसी का घर भी कहा जाता है, की यात्रा पर जाते हैं। इस यात्रा में माता लक्ष्मी उनके साथ नहीं जातीं और श्रीमंदिर में ही विराजमान रहती हैं। कई दिनों तक भगवान जगन्नाथ के वापस नहीं लौटने पर माता लक्ष्मी खुद उन्हें देखने और वापस लाने के लिए गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता लक्ष्मी की नाराजगी रथयात्रा में शामिल न होने से अधिक, भगवान जगन्नाथ से लंबे समय तक दूर रहने की थी।
क्यों तोड़ा गया भगवान जगन्नाथ का रथ?
पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता लक्ष्मी गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं तो भगवान जगन्नाथ तुरंत उनके साथ लौटने के बजाय बाद में आने को कहते हैं। इससे माता लक्ष्मी नाराज हो जाती हैं और भगवान जगन्नाथ के रथ नंदीघोष का एक हिस्सा तोड़ देती हैं। इसी घटना को आम बोलचाल में भगवान जगन्नाथ का रथ तोड़ना कहा जाता है। इसके बाद माता लक्ष्मी मुख्य रास्ते से वापस नहीं लौटतीं, बल्कि एक गुप्त रास्ते से श्रीमंदिर पहुंच जाती हैं।
प्रेम और मान-मनुहार की दिव्य लीला
धार्मिक परंपराओं में इस घटना को क्रोध का प्रतीक नहीं माना जाता। इसे दांपत्य प्रेम, विरह, मान-मनुहार और पुनर्मिलन की दिव्य लीला के रूप में देखा जाता है। यह कथा भगवान श्री जगन्नाथ और माता लक्ष्मी के बीच प्रेम, स्नेह और भावनात्मक संबंध को दर्शाती है, जो श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था है।
हेरा पंचमी अनुष्ठान का विशेष महत्व
रथयात्रा के दौरान हेरा पंचमी का अनुष्ठान आज भी पुरी की परंपरा का अहम हिस्सा है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर देवी लक्ष्मी की पालकी को विधिवत गुंडिचा मंदिर ले जाया जाता है, जहां इस पौराणिक प्रसंग का सांकेतिक रूप से दोहराया जाता है। श्रद्धालु इस दिव्य आयोजन को बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ देखते हैं, क्योंकि यह केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण और सुलह के संदेश का भी प्रतीक माना जाता है।
पीढ़ियों से जीवित है यह परंपरा
हेरा पंचमी का यह अनुष्ठान सदियों से जगन्नाथ संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है। मंदिर की परंपराओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ माता लक्ष्मी को प्रसन्न करते हैं और उनके साथ लौटते हैं। यही कारण है कि यह आयोजन आज भी श्रद्धालुओं के बीच उतनी ही आस्था और उत्साह के साथ मनाया जाता है और पीढ़ी दर पीढ़ी इसकी परंपरा जीवित है।
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