अमेरिकी कांग्रेस ने रूस और ईरान से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का एक कड़ा विधेयक पारित कर दिया है। ‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रसिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ नामक यह बिल हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में 262-159 के भारी बहुमत से पास हो गया, जिसे सीनेट से पहले ही मंजूरी मिल चुकी थी। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर करते ही यह कानून में बदल जाएगा। दिल्ली में हुए हालिया ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के बाद आए इस फैसले का सबसे बड़ा आर्थिक नुकसान भारत और चीन को उठाना पड़ सकता है।
आर्थिक प्रतिबंध के पीछे अमेरिका की सामाजिक चिंताएं
कूटनीतिक जानकारों के अनुसार, तेल खरीद पर बंदिशें तो केवल एक मुखौटा हैं; वास्तविक वजह पश्चिमि और श्वेत बहुलता वाले देशों में दक्षिण एशियाई (ब्राउन) लोगों का बढ़ता प्रभाव और संपन्नता है। अमेरिका, कनाडा, और स्वीडन जैसे देशों में अपनी विद्या, योग्यता और व्यापारिक सफलता के दम पर भारतीय समुदाय ने अर्थव्यवस्था के अहम संसाधनों पर मजबूत पकड़ बना ली है। यही वजह है कि श्वेत आबादी के बीच जनसांख्यिकीय बदलाव और स्थानीय पहचान को लेकर असहजता और द्वेष की भावना बढ़ने लगी है।
अमेरिका में मैक्सिको के बाद दूसरा सबसे बड़ा प्रवासी समूह
आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की आबादी वर्ष 2000 में जहां 1.8 मिलियन थी, वहीं अब यह बढ़कर 5.2 मिलियन के पार पहुंच चुकी है। भारत में जन्में 32 लाख प्रवासी अमेरिका में मैक्सिको के बाद दूसरा सबसे बड़ा विदेशी समुदाय बनाते हैं। हालांकि, वे कुल अमेरिकी आबादी का महज एक प्रतिशत से थोड़ा अधिक हैं, लेकिन कैलिफोर्निया, टेक्सास, न्यूयॉर्क और न्यू जर्सी जैसे राज्यों में तकनीकी, स्वास्थ्य, फार्मा और उच्च शिक्षा के क्षेत्रों में उनका दबदबा है।
अमेरिका में बसे भारतीय प्रवासियों में से लगभग 77 से 82 प्रतिशत लोग स्नातक या उससे उच्च डिग्री धारक हैं। आईटी सेक्टर से लेकर होटल, गैस स्टेशन और बड़े रिटेल व्यवसायों तक में भारतीयों की गहरी पैठ है। हालांकि, बोस्टन में बसे वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि भारतीय अमेरिकी समाज का राष्ट्रीय जनसांख्यिकीय संतुलन तो नहीं बिगाड़ रहे, लेकिन अपनी उच्च दक्षता और निवेश क्षमता के बल पर वे वहां की पेशेवर, उपनगरीय और सांस्कृतिक बनावट को बहुत गहराई से सकारात्मक रूप में बदल रहे हैं।
भारतीयों को एक शांतिपूर्ण और कानूनप्रिय समुदाय माना जाता है, जिसका अमेरिका की आर्थिक उन्नति में बड़ा योगदान है। हालांकि, कई बार स्थानीय लोग अन्य दक्षिण एशियाई देशों के नागरिकों को भी भारतीय समझ लेते हैं। प्यू रिसर्च के ताजा आंकड़ों के अनुसार, हिंदू राष्ट्रवाद, व्यापारिक नीतियों और रूस से संबंधों जैसे राजनीतिक मुद्दों के चलते अमेरिका में भारत के प्रति अनुकूल राय 2023 के 51 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2026 में 45 प्रतिशत के करीब पहुंच गई है।
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