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न बड़ी गाड़ियां, न बैनर का खर्चा, NSUI ने काटा टिकट… कंडक्टर का बेटा DU में इतिहास लिख गया

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) चुनाव 2026 में एक बड़ा ऐतिहासिक उलटफेर देखने को मिला है। किसी बड़े राजनीतिक घराने के समर्थन, महंगी गाड़ियों के काफिले और राष्ट्रीय पार्टियों के सिंबल के बिना चुनाव मैदान में उतरे आम छात्र दीपांशु शोकीन ने डूसू के उपाध्यक्ष पद पर कब्जा जमा लिया है। उन्होंने करोड़ों रुपये का बजट खर्च करने वाली अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) और भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI) जैसी दिग्गज छात्र राजनीतिक मशीनरियों को करारी शिकस्त दी है।

डीटीसी कंडक्टर के बेटे का नंगे पैर संघर्ष

दिल्ली के पीरागढ़ी निवासी राकेश कुमार के बेटे दीपांशु की पारिवारिक पृष्ठभूमि बेहद साधारण है। उनके पिता दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (DTC) में अनुबंध के आधार पर कंडक्टर के रूप में कार्यरत हैं। शहीद भगत सिंह कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद दीपांशु वर्तमान में डीयू से ‘बुद्धिस्ट स्टडीज’ में स्नातकोत्तर (PG) कर रहे हैं। सत्य निकेतन क्षेत्र में एक पीजी इमारत के ढहने की घटना के बाद, उन्होंने छात्रों की सुरक्षा और हॉस्टल की मनमानी के विरोध में जूते-चप्पल त्याग दिए थे। महीनों तक नंगे पैर रहकर छात्रों के हक के लिए संघर्ष करना ही कैंपस में उनकी मुख्य पहचान बन गया।

टिकट कटने के बाद निर्दलीय मैदान में उतरने का फैसला

दीपांशु पिछले 4 वर्षों से NSUI के एक समर्पित कार्यकर्ता के रूप में कैंपस में सक्रिय थे। उन्होंने बताया कि संगठन ने शुरुआत में उन्हें उपाध्यक्ष पद का प्रत्याशी घोषित करते हुए उनका आधिकारिक पोस्टर भी जारी कर दिया था। हालांकि, अंतिम समय में पार्टी के भीतर प्रभाव के चलते उनका टिकट काटकर एक बड़े नेता के पुत्र को दे दिया गया। इस घटना के बाद दीपांशु ने पीछे हटने के बजाय निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ने का संकल्प लिया।

छात्रों के भाईचारे ने दिलाई ऐतिहासिक जीत

टिकट कटने को अपनी ताकत बनाते हुए दीपांशु ने किसी अन्य दल का दामन थामने के बजाय आम विद्यार्थियों के समर्थन पर भरोसा जताया। ‘डीयू का यकीन, दीपांशु शोकीन’ के नारे के साथ उन्होंने बिना किसी पार्टी फंड के चुनाव प्रचार चलाया। आम छात्रों ने चुनाव में गाड़ियों और धनबल की संस्कृति के खिलाफ मतदान कर दीपांशु को विजयी बनाया। उनकी यह जीत डूसू के इतिहास में एक अनूठी नजीर बन गई है, जिसने साबित कर दिया कि जनसमर्थन के आगे धनबल और वंशवाद की राजनीति टिक नहीं सकती।

 

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