आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में गूगल के प्रस्तावित 15 अरब डॉलर (करीब 1.25 लाख करोड़ रुपये) के डेटा सेंटर हब का निर्माण तेजी से जारी है, लेकिन पानी की उपलब्धता और जंगल पर संभावित असर को लेकर पर्यावरण समूहों का विरोध बढ़ता जा रहा है। यह परियोजना भारत में गूगल का अब तक का सबसे बड़ा निवेश मानी जा रही है। निर्माण स्थल पर जमीन समतल किया जा रही है और बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य चल रहा है। हालांकि, पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि परियोजना को संभावित पर्यावरणीय जोखिमों का विश्लेषण किए बिना मंजूरी दी गई। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व वाली आंध्र प्रदेश सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है।
पानी की उपलब्धता को लेकर विरोध
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि विशाखापत्तनम पहले से ही पानी की कमी से जूझ रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार शहर को हर दिन 410 मिलियन लीटर पानी उपलब्ध हो रहा है, जबकि जरूरत 480 मिलियन लीटर की है। लगभग 25 लाख आबादी वाले शहर में पानी की राशनिंग भी आम बात है। हाल के दिनों में कार्यकर्ताओं और बच्चों ने “We Cannot Drink Data” (हम डेटा नहीं पी सकते) जैसे नारों के साथ प्रदर्शन किए। ग्रीन विशाखा संस्था के संस्थापक राजा राम मोहन रॉय ने कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन यह लोगों की आजीविका और बुनियादी जरूरतों की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
हाई कोर्ट में पहुंचा मामला
जल बिरादरी नामक संगठन ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि यह परियोजना आसपास के जलाशयों पर दबाव डालेगी। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से इस मामले में जवाब मांगा है और अगली सुनवाई 24 अगस्त को होगी। राज्य सरकार ने इन दावों को भ्रामक बताया है, लेकिन कहा है कि अगर किसी चिंता में तथ्य होंगे तो सरकार उस पर विचार करेगी।
गूगल का पक्ष
गूगल ने कहा है कि परियोजना सभी लागू कानूनों के अनुसार विकसित की जाएगी और स्थानीय जल संसाधनों की सुरक्षा के लिए एडवांस्ड एयर कूलिंग तकनीक का उपयोग किया जाएगा, जिससे पानी की खपत कम होगी। इस परियोजना का निर्माण उद्योगपति गौतम अडानी समूह की साझेदारी में किया जा रहा है। अनुमान है कि इससे करीब 1.88 लाख रोजगार पैदा होंगे।
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