इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने अपनी आवाज के दुरुपयोग को रोकने के लिए एक कानूनी कदम उठाया है। उन्होंने यूरोपीय संघ के इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑफिस (EUIPO) में अपनी आवाज का ट्रेडमार्क कराने के लिए आवेदन किया है। इसका मकसद AI की मदद से उनकी आवाज का इस्तेमाल कर बनाए जाने वाले फर्जी ऑडियो और वीडियो से बचाव करना है।
कुछ सेकंड की आवाज से बन सकता है नकली ऑडियो
डीपफेक ऐसी AI तकनीक है, जिसके जरिए किसी व्यक्ति के चेहरे, आवाज या वीडियो को इस तरह बदला जा सकता है कि नकली कंटेंट भी वास्तविक जैसा लगे। ‘डीपफेक’ नाम में ‘डीप’ शब्द डीप लर्निंग से आया है, जिसमें AI बड़ी मात्रा में डेटा से किसी व्यक्ति की आवाज या चेहरे के पैटर्न सीखता है।वॉयस क्लोनिंग में किसी व्यक्ति की असली आवाज के नमूनों से उसके बोलने के अंदाज की नकल तैयार की जा सकती है। इसी तरह वीडियो में फेस स्वैपिंग और लिप-सिंक जैसी तकनीकों से किसी व्यक्ति को ऐसी बात कहते या करते हुए दिखाया जा सकता है, जो उसने वास्तव में नहीं की। पहले डीपफेक बनाने के लिए महंगे सॉफ्टवेयर और तकनीकी विशेषज्ञता की जरूरत होती थी। अब कई ऑनलाइन टूल और ऐप के कारण यह काम काफी आसान हो गया है।
मेलोनी ने क्यों उठाया यह कदम?
जॉर्जिया मेलोनी खुद डीपफेक से जुड़े विवाद का सामना कर चुकी हैं। उनकी तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ कर अश्लील सामग्री तैयार किए जाने का मामला सामने आया था। ऐसे अनुभवों के बीच अब उन्होंने अपनी आवाज को कानूनी सुरक्षा देने की कोशिश की है। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रेडमार्क आवेदन के साथ करीब चार सेकंड का ऑडियो सैंपल दिया गया है, जिसमें मेलोनी अपना नाम बोलती हैं। यदि आवेदन मंजूर होता है तो ट्रेडमार्क के तहत उनकी आवाज के व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर कानूनी अधिकार हासिल करने में मदद मिल सकती है। ट्रेडमार्क आम तौर पर 10 साल के लिए दिया जाता है और इसके बाद इसे नवीनीकृत किया जा सकता है। हालांकि, ट्रेडमार्क अपने आप हर तरह के AI डीपफेक को तकनीकी रूप से रोक नहीं देता। इसका इस्तेमाल किसी अनधिकृत उपयोग के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के लिए किया जा सकता है।
भारत में भी चुनावों के दौरान सामने आया खतरा
डीपफेक का इस्तेमाल सिर्फ सेलिब्रिटी या नेताओं की छवि खराब करने तक सीमित नहीं है। इसका इस्तेमाल राजनीतिक भ्रम फैलाने, ब्लैकमेलिंग, धोखाधड़ी और गलत सूचना के लिए भी किया जा सकता है। भारत में 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान कई नेताओं और सार्वजनिक हस्तियों से जुड़े AI-जनरेटेड या एडिटेड वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे। चुनाव आयोग को भी AI और डीपफेक से संबंधित सामग्री को लेकर एडवाइजरी जारी करनी पड़ी थी। इटली में भी मेलोनी के अलावा कुछ कलाकार अपनी आवाज को ट्रेडमार्क कराने जैसे कदम उठा चुके हैं। AI के तेजी से फैलते इस्तेमाल के बीच डीपफेक की पहचान के लिए तकनीकी टूल, कानूनी प्रावधान और डिजिटल जागरूकता तीनों की जरूरत बढ़ रही है। मेलोनी का कदम इसी बदलती डिजिटल दुनिया की ओर इशारा करता है, जहां किसी व्यक्ति की आवाज और चेहरा भी उसकी डिजिटल पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।
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