चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा से ठीक पहले अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। सऊदी अरब ने अमेरिकी डॉलर की बादशाहत को चुनौती देने के लिए बनाए गए चीन के महत्वाकांक्षी क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम ‘mBridge’ से खुद को अलग कर लिया है। इस फैसले को चीन के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। जानकारों का मानना है कि इस कदम के जरिए सऊदी अरब ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका और चीन के बीच वैश्विक शक्ति संतुलन की होड़ में वह किसके पाले में खड़ा है।
जानिए क्या है चीन का ‘mBridge’ पेमेंट सिस्टम
डॉलर पर अपनी निर्भरता घटाने के उद्देश्य से चीन ने ब्लॉकचेन तकनीक पर आधारित ‘mBridge’ नाम से एक भुगतान प्रणाली विकसित की थी। यह प्रणाली अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक ‘SWIFT’ सिस्टम का एक विकल्प है, जिसका उपयोग भारत सहित दुनिया के अधिकांश देश व्यापारिक भुगतानों के लिए करते हैं। mBridge का मुख्य काम विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंकों की डिजिटल करेंसी का उपयोग करके सीमा पार लेनदेन को अधिक सस्ता, सुरक्षित और तेज बनाना है।
4 देश अब भी प्रोजेक्ट में शामिल
सऊदी अरब के बाहर होने के बावजूद इस प्रोजेक्ट में शामिल अन्य चार देश चीन, हांगकांग, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और थाईलैंड अविचलित हैं और प्रोजेक्ट पर काम जारी है। दूसरी ओर, सऊदी अरब ने सफाई देते हुए कहा है कि उसका बाहर निकलना पूर्व निर्धारित योजना का हिस्सा था। उसने साल 2023 में इस सिस्टम में एक ऑब्जर्वर के रूप में प्रवेश किया था और 13 मई, 2025 को इसका ‘प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट’ पूरा होने के बाद उसकी भागीदारी स्वतः समाप्त हो गई है।
अमेरिकी दबाव में उठाया गया कदम?
भले ही सऊदी अरब इसे अपनी पूर्व नियोजित योजना बता रहा हो, लेकिन वैश्विक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी ने यह फैसला अमेरिका के कूटनीतिक दबाव में आकर लिया है। चीन के इस डिजिटल पेमेंट नेटवर्क का उद्देश्य वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में डॉलर के वर्चस्व को कमजोर करना था, लेकिन सऊदी अरब के हटने से चीन की इस वैश्विक रणनीति को गहरा धक्का लगा है।
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