US Tariff On India: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जेपी मॉर्गन के सीईओ जेमी डिमोन ने रूस के खिलाफ प्रस्तावित आर्थिक कार्रवाई को लेकर अहम सलाह दी है। डिमोन ने कहा कि रूस पर दबाव बनाने के लिए भारत पर टैरिफ या रूसी तेल से जुड़े नए प्रतिबंध लगाने से पहले उसके असर को समझना जरूरी है। उनका कहना है कि ऐसी कार्रवाई भारत के साथ-साथ पूरी दुनिया के तेल बाजार को प्रभावित कर सकती है।
100% टैरिफ की शक्ति अब ट्रंप के पास
अमेरिका में रूस और ईरान से जुड़े नए प्रतिबंध कानून पर ट्रंप हस्ताक्षर कर चुके हैं। कानून राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। हालांकि, भारत पर 100% टैरिफ अपने-आप लागू नहीं हुआ है। अमेरिकी प्रशासन को इसके इस्तेमाल को लेकर आगे फैसला करना होगा।
रूसी तेल पर डिमोन क्यों जता रहे चिंता
मुंबई में 21-22 सितंबर को हो रही जेपी मॉर्गन इंडिया कॉन्फ्रेंस के दौरान डिमोन ने रूस के तेल पर किसी नए टैरिफ के प्रति अपना विरोध जताया। उन्होंने कहा कि अमेरिका को यह देखना चाहिए कि ऐसी कार्रवाई का असर भारत और वैश्विक तेल बाजार पर क्या पड़ेगा।
भारत रूस से तेल क्यों खरीदता है
मामला सिर्फ सस्ते तेल का नहीं है। भारत की रिफाइनरियां अलग-अलग तरह के कच्चे तेल को प्रोसेस करने की क्षमता के हिसाब से डिजाइन की गई हैं। हर रिफाइनरी हर तरह के क्रूड को एक जैसी दक्षता से प्रोसेस नहीं कर सकती। ऐसे में अगर भारत रूसी तेल की खरीद घटाता है तो उसे दूसरे स्रोतों से क्रूड लेना होगा, लेकिन वह तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए उतना उपयुक्त हो, यह जरूरी नहीं है।
रूस का तेल बंद हुआ तो असर कहां पड़ेगा
डिमोन ने इसी आपूर्ति के गणित पर जोर दिया। अगर भारत रूसी क्रूड नहीं खरीदेगा तो वह तेल किसी दूसरे बाजार में जा सकता है, जबकि भारत को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए किसी अन्य स्रोत से तेल लेना पड़ेगा। यानी वैश्विक बाजार से तेल गायब नहीं होगा, लेकिन खरीदार और सप्लाई रूट बदलने से कीमतों और उपलब्धता पर दबाव बन सकता है।
रूस पर दबाव, लेकिन भारत को नुकसान क्यों
डिमोन ने रूस के खिलाफ ज्यादा कार्रवाई की जरूरत की बात भी कही और यूक्रेन की मदद के लिए अमेरिका को आगे कदम उठाने की सलाह दी। उनकी आपत्ति रूस पर दबाव बनाने से नहीं, बल्कि उसके तरीके और संभावित असर से जुड़ी है। उनका सुझाव है कि अमेरिका को भारत के साथ बातचीत करके यह तय करना चाहिए कि प्रतिबंध या टैरिफ किस तरह लगाए जाएं, ताकि भारतीय रिफाइनिंग उद्योग और वैश्विक तेल बाजार पर अनावश्यक झटका न पड़े।
भारत की बड़ी तेल जरूरत बना अहम मुद्दा
भारत दुनिया के प्रमुख तेल आयातकों में शामिल है और अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। मौजूदा समय में रूस भारत के प्रमुख क्रूड सप्लायरों में है। इसलिए भारत की खरीद में बड़ा बदलाव सिर्फ दोनों देशों के व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक तेल मांग और कीमतों पर भी असर डाल सकता है।
ट्रेड डील पर भी डिमोन की नजर
डिमोन ने भारत और अमेरिका के बीच चल रही ट्रेड डील पर भी बातचीत आगे बढ़ाने की जरूरत बताई। उन्होंने दोनों देशों की सरकारों से बैठकर समझौते को पूरा करने की दिशा में काम करने की सलाह दी और कारोबार के लिए नियमों व कानूनों में स्थिरता को अहम बताया। ऐसे में रूसी तेल, अमेरिकी टैरिफ और भारत-अमेरिका ट्रेड डील तीनों मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े नजर आ रहे हैं।
तेल बाजार का गणित ट्रंप के लिए बड़ी चुनौती
पूरे मामले में अमेरिका रूस की तेल कमाई पर दबाव बनाना चाहता है, जबकि भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए लगातार कच्चे तेल की आपूर्ति बनाए रखना जरूरी है। रूसी क्रूड से दूरी बढ़ने पर भारत को वैकल्पिक स्रोतों की ओर जाना पड़ सकता है। इसका असर खरीद लागत, रिफाइनिंग और आगे पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों तक पहुंच सकता है। यही वजह है कि जेमी डिमोन का संदेश यह है कि रूस पर दबाव बनाने की रणनीति तैयार करते समय भारत और वैश्विक तेल बाजार के असर को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
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