Gig Workers Social Security: जोमैटो, स्विगी जैसी फूड डिलीवरी कंपनियों के डिलीवरी पार्टनर और ओला, उबर, रैपिडो जैसे प्लेटफॉर्म से जुड़े ड्राइवर्स के लिए सरकार बड़ा सामाजिक सुरक्षा कदम उठाने जा रही है। दिन-रात धूप और बारिश में काम करने वाले इन गिग वर्कर्स को अब स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना कवर और पेंशन जैसी सुविधाओं का लाभ मिल सकेगा। इसके लिए सोशल सिक्योरिटी फंड बनाया जा रहा है।
ऐप कंपनियों पर लगेगा 1 से 2% टैक्स
सरकार ने ऐप आधारित कंपनियों पर उनके टर्नओवर का 1 से 2% टैक्स लगाने का नियम बनाया है। हालांकि, यह राशि वर्कर के कुल पेआउट के 5% से ज्यादा नहीं हो सकती। कंपनियों से मिलने वाला यह पैसा सीधे वेलफेयर फंड में जाएगा, जिसका इस्तेमाल गिग वर्कर्स की सामाजिक सुरक्षा के लिए किया जाएगा।
इंसेंटिव में कटौती का भी पड़ सकता है असर
अगर कंपनियां इस अतिरिक्त खर्च की भरपाई के लिए वर्कर्स के डेली इंसेंटिव में कटौती करती हैं, तो उनकी मौजूदा कमाई थोड़ी कम हो सकती है। हालांकि, इसके बदले उन्हें भविष्य के लिए स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना कवर और पेंशन जैसी सुरक्षा मिलने की उम्मीद है।
50 रुपये के पेआउट पर सिर्फ 2.5 रुपये तक
स्विगी और जोमैटो जैसी फूड डिलीवरी कंपनियों के लिए इस नियम का असर तुलनात्मक रूप से कम माना जा रहा है। एक डिलीवरी पार्टनर को प्रति ऑर्डर औसतन 30 से 50 रुपये का पेआउट मिलता है। इसका 5% निकालें तो यह रकम करीब 1.5 से 2.5 रुपये बैठती है। इतनी छोटी राशि को फूड डिलीवरी ऐप्स अपने मौजूदा बिजनेस मॉडल में आसानी से मैनेज कर सकती हैं।
Ola-Uber जैसी कंपनियों की बढ़ सकती है चिंता
दूसरी ओर, ओला, उबर और रैपिडो जैसी कैब और बाइक कंपनियों के सामने चुनौती ज्यादा बड़ी हो सकती है। एक कैब ड्राइवर को लंबी ट्रिप पूरी करने पर करीब 500 से 1000 रुपये तक का पेआउट मिलता है। ऐसे में 5% की राशि 25 से 50 रुपये तक हो सकती है, जो सीधे सोशल सिक्योरिटी फंड में जाएगी।
हर राइड पर 25 से 50 रुपये का अतिरिक्त बोझ
पहले से कम मुनाफे पर चल रही कैब कंपनियों के लिए हर राइड पर 25 से 50 रुपये तक की राशि निकालना उनके बिजनेस मॉडल पर दबाव डाल सकता है। यही वजह है कि इस प्रस्ताव को लेकर कैब और बाइक टैक्सी कंपनियों के बीच ज्यादा चिंता देखी जा रही है।
किराया बढ़ा तो ग्राहकों पर पड़ेगा असर
इस अतिरिक्त लेवी की भरपाई के लिए कैब कंपनियों के पास किराया बढ़ाने का विकल्प हो सकता है। अगर राइड महंगी होती है तो ग्राहकों की मांग कम होने का खतरा रहेगा। इससे कंपनियों की कमाई पर भी असर पड़ सकता है।
ड्राइवरों की कमाई काटी तो बढ़ सकता है विरोध
दूसरा विकल्प यह है कि कंपनियां सोशल सिक्योरिटी फंड की रकम ड्राइवरों की कमाई से काटें। पेट्रोल-डीजल और कार की ईएमआई जैसे खर्चों से पहले ही परेशान ड्राइवर्स अगर अपनी कमाई में और कटौती देखते हैं, तो नाराजगी बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में देशभर में कैब स्ट्राइक जैसी नौबत आने की आशंका भी जताई जा रही है।
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