हरियाणा के फरीदाबाद जिले में अनंगपुर, अनखीर, लक्कड़पुर और मेवला महाराजपुर गांवों के 5,938 मकानों के अस्तित्व पर गहरा संकट बना हुआ है। ब्रिटिश काल के पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट (PLPA) के तहत इस पूरी जमीन को वन भूमि घोषित किया गया है। अकेले अनंगपुर गांव में 5,771 घर इस दायरे में आते हैं। सुप्रीम कोर्ट के 2022 के आदेश के बाद इन निर्माणों को अवैध मानकर बुलडोजर चलाने की तैयारी थी, लेकिन फिलहाल सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) की रिपोर्ट के कारण यह मामला अधर में लटका हुआ है।
1900 के कानून से आज के घर कैसे हुए अवैध
वर्ष 1900 में तत्कालीन पंजाब सरकार ने मिट्टी के कटाव को रोकने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए PLPA कानून बनाया था। इसकी धारा 3 के तहत बड़े क्षेत्र को संरक्षित और धारा 4 के तहत गैर-वानिकी गतिविधियों पर रोक लगाई जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने 2022 के अपने फैसले में स्पष्ट किया कि PLPA की धारा 4 में आने वाली जमीन फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट 1980 के अंतर्गत आती है। अदालत ने 25 अक्टूबर 1980 के बाद बिना केंद्र सरकार की मंजूरी के बने सभी घरों और इमारतों को अवैध करार दे दिया था।
सुप्रीम कोर्ट की CEC कमेटी भी नहीं निकाल पाई हल
अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के विरोध में ग्रामीणों द्वारा की गई अपीलों के बाद शीर्ष अदालत ने सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) का गठन किया था। कमेटी को प्रत्येक प्लॉट का सर्वे कर यह रिपोर्ट देनी थी कि कौन सा निर्माण अधिसूचित खसरे में आता है। हालांकि, 18 सितंबर को पेश अपनी अंतरिम रिपोर्ट में CEC ने स्वीकार किया है कि वह अब तक इस जटिल समस्या का कोई ठोस हल नहीं ढूंढ पाई है और यह मुद्दा पूरी तरह अनसुलझा बना हुआ है।
आबादी और अतिक्रमण के बीच उलझा पूरा मामला
यह पूरा विवाद वास्तविक आबादी वाले आवासीय क्षेत्रों और अवैध अतिक्रमण के बीच फंसा हुआ है। CEC की जांच के दायरे में केवल रिहायशी मकान ही नहीं, बल्कि व्यावसायिक मैरिज हॉल, बैंक्वेट हॉल और बड़े-बड़े फार्महाउस भी शामिल हैं। कमेटी अब हरियाणा सरकार और केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के साथ मिलकर कोई बीच का रास्ता निकालने का प्रयास कर रही है, ताकि सालों से रह रहे ग्रामीणों को बेघर होने से बचाया जा सके।
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