हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने फैमिली पेंशन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि भले ही पहली पत्नी के जीवित रहते किया गया दूसरा विवाह कानूनी रूप से अमान्य हो, लेकिन पहली पत्नी की मृत्यु के बाद दूसरी पत्नी को लंबे समय तक साथ रहने के आधार पर फैमिली पेंशन और वित्तीय संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता। जस्टिस गुगमीत सिंह संधावालिया और जस्टिस बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने इस संबंध में राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए दूसरी पत्नी का नाम सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज करने का आदेश दिया है।
दुसरा विवाह अवैध हो सकता है
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत पहली पत्नी के रहते दूसरा विवाह करना कानूनी रूप से अवैध माना जाता है, लेकिन इसे पूरी तरह ‘अनैतिक’ ठहरा देना सही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि फैमिली पेंशन का मूल उद्देश्य किसी असहाय महिला को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना और समाज में उसकी गरिमा व सुरक्षा को सुनिश्चित करना है।
संतान न होने पर पहली पत्नी की बहन से की थी दूसरी शादी
यह पूरा विवाद महेश राम नाम के एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी से जुड़ा है, जो वर्ष 2003 में अपनी सेवा से रिटायर हुए थे। महेश राम की पहली पत्नी कमलेश देवी थीं और दोनों की कोई संतान नहीं थी। इस कारण महेश राम ने अपनी पहली पत्नी के जीवित रहते ही उनकी सगी बहन ज्वाला देवी से दूसरा विवाह कर लिया था। 20 अप्रैल 2020 को पहली पत्नी कमलेश देवी का निधन हो गया।
सर्विस रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने पर शुरू हुआ था विवाद
पहली पत्नी कमलेश देवी के निधन के बाद महेश राम ने अपने पेंशन पेमेंट ऑर्डर (PPO) और आधिकारिक सर्विस रिकॉर्ड में अपनी दूसरी पत्नी ज्वाला देवी का नाम दर्ज कराने के लिए विभाग से अनुरोध किया। हालांकि, प्रशासन ने दूसरे विवाह की कानूनी मान्यता का हवाला देते हुए इसे अस्वीकार कर दिया, जिसके बाद महेश राम ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने आर्थिक सशक्तीकरण के सिद्धांत को सर्वोपरि मानते हुए अब महेश राम के पक्ष में फैसला सुनाया है।
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