दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण और आतिशबाजी से जुड़े संवेदनशील मामले पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि वह पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं है। हालांकि, न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने अधिकारियों की कार्यशैली पर गहरी नाराजगी जताते हुए कड़े शब्दों में कहा कि यदि कोर्ट के आदेशों को धरातल पर कड़ाई से लागू नहीं किया गया तो यह एक मजाक बनकर रह जाएगा। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह मुद्दा हर जीवित प्राणी के स्वास्थ्य से जुड़ा है, इसलिए केवल हर साल आदेश जारी करने के बजाय जमीनी स्तर पर मौके पर जाकर सख्त कार्रवाई करना बेहद जरूरी है।
जन-जागरूकता के लिए हस्तियों की मदद का सुझाव
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने अधिकारियों को पटाखों को सही तरीके से नियंत्रित करने और परंपराओं व पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की हिदायत दी। पीठ ने सुझाव दिया कि हर साल कागजी आदेश जारी करने के बजाय जन-जागरूकता फैलाने के लिए खेल जगत की प्रमुख हस्तियों और अन्य प्रभावशालियों की सेवाएं ली जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि बिना जन-सहयोग के प्रदूषण नियंत्रण का यह प्रयास सफल नहीं हो सकता। इस दौरान दिल्ली सरकार और कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (CAQM) की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि पुराने वाहनों पर रोक, निर्माण कार्यों पर नियंत्रण और दफ्तरों के समय में बदलाव जैसे कई व्यापक उपाय नवंबर से लागू किए जाएंगे।
ग्रीन पटाखों की आड़ में उल्लंघन
मामले में अदालत की सहायता कर रहीं एमिकस क्यूरी ने दलील दी कि आतिशबाजी से निकलने वाला पार्टिकुलेट मैटर (PM) इंसानी फेफड़ों को भारी नुकसान पहुंचाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले साल दिल्ली-एनसीआर में ग्रीन पटाखों के नाम पर जमकर सामान्य पटाखे जलाए गए और वर्तमान में इनकी प्रामाणिकता जांचने की कोई पुख्ता व्यवस्था मौजूद नहीं है। वहीं, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने निर्माण पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग की। दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने कोर्ट को अवगत कराया कि पटाखों में बेरियम के इस्तेमाल से जुड़े मुद्दे पर आंतरिक चर्चा जारी है, जिस पर अदालत ने तीन सप्ताह बाद विचार करने का समय दिया है।
सीमित छूट और तय समयसीमा के साथ आतिशबाजी
उल्लेखनीय है कि 30 सितंबर को हुई पिछली सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह न तो पटाखों पर पूरी तरह रोक लगाएगा और न ही चौबीसों घंटे आतिशबाजी की इजाजत देगा। इस बीच, CSIR-NEERI की सिफारिशों के आधार पर कम उत्सर्जन और नियंत्रित शोर सीमा वाले ‘नेक्स्ट-जेनरेशन जॉइन्ड ग्रीन क्रैकर्स’ को केवल लाइसेंस प्राप्त निर्माताओं के माध्यम से सशर्त अनुमति देने पर विचार चल रहा है। पिछले वर्ष भी सुप्रीम कोर्ट ने परंपराओं और जनस्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाते हुए एक ‘टेस्ट केस’ के रूप में दिवाली के दिन और उससे एक दिन पहले तय समयसीमा के भीतर ही ग्रीन पटाखे जलाने की सीमित छूट दी थी।
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