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‘अधूरी वफादारी’ या धोखा? बड़े-बड़े रक्षा समझौतों के बाद भी यमन युद्ध के मैदान से क्यों पीछे हटा पाकिस्तान!

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच कूटनीतिक, धार्मिक और सैन्य संबंध दशकों पुराने हैं, जिनकी नींव 1967 में पहले सुरक्षा सहयोग समझौते के साथ रखी गई थी। साल 1979 में मक्का की ग्रैंड मस्जिद पर हमले के वक्त पाकिस्तानी विशेष बलों ने सऊदी अरब को मदद पहुंचाई थी, और 1982 के प्रोटोकॉल समझौते के तहत हजारों पाकिस्तानी सैनिकों को वहां तैनात किया गया था। नब्बे के दशक तक कभी-कभी 13,000 से 15,000 तक पाकिस्तानी सैनिक सऊदी में मौजूद रहे, जिन्होंने खाड़ी युद्ध के दौरान सीमाओं और पवित्र स्थलों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाई। सऊदी अरब ने आर्थिक मदद देकर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को सहारा दिया, तो पाकिस्तान ने अपनी सैन्य विशेषज्ञता से रिश्तों को मजबूती दी।

यमन संकट 2015: वादों और अमल का पहला बड़ा अंतर

दोनों देशों के बीच वादों और वास्तविक अमल का पहला बड़ा अंतर साल 2015 के यमन संकट के दौरान सामने आया। मार्च 2015 में सऊदी के नेतृत्व में हूती विद्रोहियों के खिलाफ शुरू हुए सैन्य अभियान में रियाद ने पाकिस्तान से जहाज, विमान और जमीनी सैनिक भेजने की मांग की थी। हालांकि, 10 अप्रैल 2015 को पाकिस्तानी संसद के संयुक्त सत्र में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास हुआ कि पाकिस्तान इस संघर्ष में तटस्थ रहकर कूटनीतिक भूमिका निभाएगा। हालांकि यह भी साफ किया गया कि यदि सऊदी की क्षेत्रीय अखंडता या मक्का-मदीना पर आंच आई, तो पाकिस्तान कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहेगा। यह फैसला सऊदी उम्मीदों के विपरीत था, जहां बयानबाजी के समर्थन के बावजूद व्यावहारिक सैन्य मदद नहीं दी गई।

साल 2025-2026 के नए रक्षा समझौते और सैन्य तैनाती

समय के साथ रिश्तों में एक बार फिर नया मोड़ आया और 17 सितंबर 2025 को प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ‘स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट’ पर हस्ताक्षर किए, जिसमें एक पर हमला दोनों पर हमला माना गया। इसके बाद 7 अगस्त 2026 को मक्का में पाकिस्तान, सऊदी और तुर्की के बीच ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ साइन हुआ, जिसके तहत 5 अक्टूबर 2026 को आपात बैठक में सैन्य बलों की त्वरित तैनाती का फैसला लिया गया। रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ और ISPR प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने बिना शर्त प्रतिबद्धता जताई। वर्तमान में सऊदी में लगभग 8,000 से 15,000 पाकिस्तानी सैनिक, जेएफ-17 लड़ाकू विमानों का स्क्वाड्रन, ड्रोन स्क्वॉड्रन और चीनी एचक्यू-9 एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद हैं, जिनका खर्च सऊदी वहन करता है।

हूती हमलों का बढ़ता खतरा और रणनीतिक सीमाएं

साल 2026 में लाल सागर में सऊदी तेल टैंकरों, नागरिक सुविधाओं और रियाद एयरपोर्ट पर हूती हमलों का सिलसिला काफी तेज हो गया, जिसमें कई लोगों की जानें गईं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ और विदेश मंत्रालय ने इन हमलों की कड़ी निंदा करते हुए सऊदी की संप्रभुता के प्रति दृढ़ समर्थन दोहराया, लेकिन हर बार यह स्पष्ट किया गया कि यह मदद पूरी तरह रक्षात्मक होगी। पाकिस्तानी सेना ने साफ कर दिया कि उसके सैनिक यमन में प्रवेश नहीं करेंगे और उनकी भूमिका केवल खुफिया, निगरानी, प्रशिक्षण और अंदरूनी सुरक्षा तक ही सीमित रहेगी।

वादों और जमीनी हकीकत के बीच संतुलन की मजबूरी

शाहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर की ओर से ‘कंधे से कंधा’ और ‘किसी भी हद तक’ जाने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन यमन में सक्रिय लड़ाई या आक्रामक सैन्य भूमिका से परहेज साफ झलकता है। पाकिस्तान की अपनी आर्थिक मजबूरियां, भारत सीमा पर सुरक्षा चिंताएं और क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की नीतियां उसे पूर्ण रूप से युद्ध में कूदने से रोकती हैं। सऊदी अरब को यह उम्मीद थी कि नए समझौतों से ठोस सैन्य समर्थन मिलेगा, लेकिन अब तक की मदद मुख्य रूप से सलाहकार और रक्षात्मक दायरे में सिमटी हुई है, जो दोनों देशों के बीच कूटनीतिक विश्वास और व्यावहारिक सहयोग के बीच एक बड़ा सवालिया निशान छोड़ती है।

 

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