Supreme Court on Delhi Protest: दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के दौरान लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त एक्शन लिया है। अदालत ने संबंधित प्राधिकारों को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा है कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न की जाए। कोर्ट ने कहा कि 9 अक्टूबर के आदेश में मेट्रो ट्रेन को अचानक बंद नहीं करने और लोगों की आवाजाही बाधित नहीं करने का निर्देश दिया गया था। इसके बावजूद आदेश की खुलेआम अवहेलना के मद्देनजर सरकार से जवाब मांगा जा रहा है। अदालत ने मंगलवार तक जवाब दाखिल करने को कहा है।
मेट्रो सेवा सामान्य रखने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत मेट्रो का नियमित संचालन जारी रखने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सभी मेट्रो स्टेशन लोगों की जरूरत के मुताबिक खुले रहने चाहिए। सरकार से यह भी स्पष्ट करने को कहा गया कि क्या 45 मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और बाहर निकलने की सुविधा बंद की गई थी।
बैरिकेड्स हटाने और इंटरनेट बहाल करने का आदेश
कोर्ट ने दिल्ली में लगाए गए बैरिकेड्स हटाने और इंटरनेट सेवा बहाल करने का निर्देश दिया। धारा 163 लागू किए जाने की सूचना व्यक्तिगत रूप से नहीं दिए जाने के सवाल पर जस्टिस बागची ने कहा कि ऐसी सूचना व्यक्तिगत तौर पर नहीं दी जाती।
नई याचिकाओं को भी सुनवाई से जोड़ा गया
जस्टिस बागची ने कहा कि पहले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को सुना गया। पूर्व अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल भी एक याचिकाकर्ता की ओर से ऑनलाइन जुड़े। अदालत ने कहा कि इस मामले में दाखिल नई याचिकाओं को सोमवार को सुना जाएगा। सिब्बल ने विशेष सुनवाई के लिए अदालत का आभार जताया, जिस पर जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत हमेशा देश की सेवा के लिए तैयार है।
‘कल दिल्ली में लोगों को खड़े होने की अनुमति नहीं थी’
एक याचिकाकर्ता के वकील ने आरोप लगाया कि दिल्ली में कल कई जगह लोगों को खड़े होने तक की अनुमति नहीं थी। उन्होंने कहा कि नागरिकों के अधिकारों का खुलेआम उल्लंघन हुआ और इस मामले में अदालत को कड़ा आदेश देना चाहिए।
वेणुगोपाल ने मांगा अवमानना नोटिस
जस्टिस बागची ने वरिष्ठ वकील केके वेणुगोपाल से पूछा, क्या आप अवमानना का नोटिस जारी करवाना चाहते हैं? वेणुगोपाल ने नोटिस जारी करने का अनुरोध किया। अदालत ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल को सुनने के बाद इस पर विचार किया जाएगा। कोर्ट ने दो विकल्प भी बताए- मामले को सोमवार को नए मामले के रूप में सूचीबद्ध किया जाए या अन्य सूचीबद्ध मामलों के साथ इसे जोड़ दिया जाए।
‘ये सिर्फ ‘उचित कार्रवाई’ का सवाल नहीं’
वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि उन्होंने पेनड्राइव में वीडियो के स्क्रीन-ग्रैब सौंपे हैं। उन्होंने वकीलों पर कार्रवाई, शादान समेत कई लोगों की हिरासत और जंतर-मंतर से बाहर हुई घटनाओं का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के बाहर अभी भी धारा 163 लागू है। उनके मुताबिक, निहत्थे बच्चों को पीटना और लात मारना केवल ‘उचित कार्रवाई’ का मामला नहीं है। उन्होंने कहा कि कई वीडियो सामने आ रहे हैं और यह मामला अब अदालत के दरवाजे तक पहुंच चुका है।
वकीलों को हिरासत में लेने का भी मुद्दा उठा
वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि कुछ वकील सीतलवाड़ चेंबर से रेड लाइट की ओर जा रहे थे, तभी पुलिस ने उन्हें घेर लिया और एक महिला पुलिसकर्मी ने उन्हें तेजी से खींचा। उन्होंने कहा कि वे पूरी तरह शांत थे। एक अन्य वकील ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़े मूल अधिकार का मामला बताया और कहा कि दिल्ली बॉर्डर, गुरुग्राम समेत अन्य जगहों से लोगों को हिरासत में लिया गया। वकील के मुताबिक करीब 6-7 हजार लोग हिरासत में लिए गए।
लोगों के जीवन और स्वतंत्रता पर कोर्ट की नजर
जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत मामले की गंभीरता समझती है। उन्होंने कहा कि पुलिस अधिकारी व्यक्तिगत तौर पर कानून-व्यवस्था कायम करने का फैसला नहीं कर सकते, जब तक राज्य प्रशासन की ओर से निर्णय न लिया जाए। कोर्ट ने कहा कि लोगों के जीवन और स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दे पर वह मामले की तह तक जाएगा और पूरी सुनवाई के बाद आदेश देगा।
सरकार से हलफनामा दाखिल करने को कहा
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हिरासत में लिए गए लोगों को तय कानून के तहत हिरासत में लिया गया था। उन्होंने बताया कि दोपहर दो बजे तक हिरासत में लिए गए वकीलों को छोड़ दिया गया। उन्होंने कहा कि सरकार को मिले निर्देश अदालत के सामने रखे जाएंगे और हलफनामे में भी दाखिल किए जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्षी पक्ष के वकीलों ने राजनीतिक भाषण दिए थे और सुप्रीम कोर्ट के अनुपातिकता के सिद्धांत के अनुसार ही व्यवस्था की गई।
सभी स्टेशन और इंटरनेट चालू रखने पर जोर
एसजी ने कहा कि रात 10 बजे से सभी मेट्रो स्टेशन खुले हुए हैं और जिन स्टेशनों को बंद किया गया था, वे अदालत के आदेश के मुताबिक कुछ समय के लिए बंद किए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को इस मुद्दे पर अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि वह कानून-व्यवस्था की प्रभारी नहीं है, लेकिन नागरिक अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने इंटरनेट बहाल करने और मेट्रो सेवा सामान्य रखने पर भी जोर दिया। जस्टिस बागची ने सिब्बल से कहा कि अदालत पर भरोसा रहना चाहिए।
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