देश में विमानन सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने के लिए पायलटों की रैंडम ड्रग टेस्टिंग बढ़ाने का सुझाव दिया गया है। फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स (FIP) ने DGCA को भेजे प्रस्ताव में मौजूदा 10 प्रतिशत सालाना न्यूनतम रैंडम टेस्टिंग की सीमा को बढ़ाने की सिफारिश की है। संगठन चाहता है कि इसे शुरुआती तौर पर 20 से 25 प्रतिशत तक किया जाए।
FIP का कहना है कि भारत में विमानों की संख्या और फ्लाइट ऑपरेशन लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में विमानन क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की साइकोएक्टिव सब्सटेंस टेस्टिंग की मौजूदा व्यवस्था की भी समय के साथ समीक्षा जरूरी है।
अभी किस तरह होती है जांच?
मौजूदा DGCA व्यवस्था के अनुसार संबंधित विमानन कर्मचारियों की साइकोएक्टिव पदार्थों के लिए जांच मुख्य रूप से यूरिन सैंपल के जरिए की जाती है। पहले स्क्रीनिंग होती है। यदि परिणाम संदिग्ध या नॉन-नेगेटिव आता है तो आगे कन्फर्मेटरी टेस्ट और मेडिकल रिव्यू की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
FIP का सुझाव है कि टेस्टिंग केवल साल में तय प्रतिशत पूरा करने की औपचारिकता न बने। इसके बजाय पूरे साल अलग-अलग समय पर वास्तविक रूप से रैंडम जांच की जानी चाहिए। किसी पायलट का पहले टेस्ट हो चुका हो तब भी उसे दोबारा अचानक होने वाली जांच के लिए चुना जा सके।
10 से 25 प्रतिशत तक बढ़ाने की सिफारिश
FIP ने मौजूदा 10 प्रतिशत न्यूनतम कवरेज को पहले 20-25 प्रतिशत तक ले जाने का सुझाव दिया है। संगठन ने आगे जरूरत और जोखिम के आधार पर इसे 25 से 50 प्रतिशत तक बढ़ाने का मॉडल भी सामने रखा है। इसका उद्देश्य जांच की कवरेज बढ़ाकर सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करना है।
लार से जांच को भी शामिल करने का प्रस्ताव
FIP ने ओरल-फ्लूड यानी मुंह की लार से होने वाली जांच को भी ड्रग टेस्टिंग व्यवस्था में शामिल करने की बात कही है। हालांकि, संगठन यूरिन टेस्ट को पूरी तरह हटाने के पक्ष में नहीं है। उसका सुझाव है कि दोनों तरीकों का इस्तेमाल उनकी जरूरत और परिस्थिति के अनुसार किया जाए। एयरपोर्ट पर बड़ी संख्या में होने वाली रैंडम या संदेह आधारित जांच में ओरल-फ्लूड टेस्ट उपयोगी हो सकता है। वहीं, जहां किसी पदार्थ को लंबे समय तक पहचानने की जरूरत हो वहां यूरिन टेस्ट जारी रखने का सुझाव दिया गया है।
FIP के एक इलस्ट्रेटिव मॉडल के अनुसार यूरिन सैंपल लेने में करीब 45 मिनट, जबकि ओरल-फ्लूड सैंपल में लगभग 15 मिनट लग सकते हैं। इस अनुमान के आधार पर सैंपल कलेक्शन का वर्कलोड करीब 66.7 प्रतिशत तक कम हो सकता है। हालांकि FIP ने स्पष्ट किया है कि ये केवल योजना बनाने के लिए इस्तेमाल किए गए अनुमान हैं। भारत में पायलट प्रोग्राम के जरिए इनकी वास्तविक उपयोगिता और व्यवहारिकता की जांच करना जरूरी होगा। फिलहाल ये सुझाव FIP की ओर से दिए गए हैं और इन्हें लागू करने पर अंतिम फैसला DGCA को लेना है।
टेस्ट पॉजिटिव आने का मतलब तुरंत दोषी नहीं
प्रस्ताव में यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी शुरुआती स्क्रीनिंग में नॉन-नेगेटिव परिणाम आने का अर्थ यह नहीं है कि पायलट नशे में था या उड़ान के लिए अयोग्य था। पहले कन्फर्मेटरी टेस्ट, फिर मेडिकल रिव्यू और उसके बाद नियामकीय निर्णय की प्रक्रिया होनी चाहिए।
दिल्ली हाईकोर्ट में दर्ज मामले में भी DGCA की मौजूदा व्यवस्था के तहत स्क्रीनिंग के बाद कन्फर्मेटरी टेस्ट और मेडिकल रिव्यू का उल्लेख किया गया है। FIP ने डॉक्टर की सलाह से ली जाने वाली दवाओं को भी ध्यान में रखने की बात कही है, क्योंकि कुछ वैध दवाएं टेस्ट में प्रभावित परिणाम दे सकती हैं।
आगे बढ़ सकती है टेस्टिंग
FIP ने शुरुआती तौर पर टेस्टिंग कवरेज को 20-25% तक बढ़ाने और जोखिम के आधार पर भविष्य में इसे 25-50% तक ले जाने का मॉडल सुझाया है। हालांकि, यह फिलहाल एक प्रस्ताव है जिसको लेकर आखिरी फैसला DGCA की ओर से लिया जाना है।