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सिवनी जिला अस्पताल के SNCU वार्ड में 3 महीने में 46 नवजात बच्चों की मौत, परिजनों ने लगाए लापरवाही के आरोप

मध्य प्रदेश के सिवनी जिला अस्पताल स्थित स्पेशल न्यू बोर्न केयर यूनिट (SNCU) से एक दर्दनाक और चिंताजनक मामला सामने आया है, जहां पिछले तीन महीनों (1 जुलाई से 30 सितंबर) के दौरान भर्ती कराए गए 592 नवजात बच्चों में से 46 मासूमों की मौत हो चुकी है। आंकड़ों के अनुसार, औसतन हर दूसरे दिन एक नवजात की जान जा रही है। यदि पिछले छह महीनों (1 अप्रैल से 30 सितंबर) के आंकड़ों पर नजर डालें, तो इस वार्ड में दम तोड़ने वाले नवजात शिशुओं की कुल संख्या 80 तक पहुंच चुकी है।

परिजनों ने लगाया अनदेखी और इलाज में देरी का आरोप

अस्पताल में अपनों को खोने वाले परिवारों का रो-रोकर बुरा हाल है और उन्होंने डॉक्टरों पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए हैं। डुंगरिया निवासी मनीष वरकड़े ने बताया कि उनकी पत्नी को सही समय पर इलाज नहीं मिला और तीन दिन बाद ऑपरेशन किया गया, जिसके बाद बच्चे को आईसीयू में रखा गया जहां उसने दम तोड़ दिया। इसी तरह जावरकाठी निवासी संजय उइके ने बताया कि सातवें महीने में हुई डिलीवरी के बाद कम वजन के बच्चे को मशीन में रखा गया, लेकिन 4-5 दिनों के इलाज के बाद उसकी भी मौत हो गई।

विधायक ने किया औचक निरीक्षण और सिविल सर्जन की सफाई

मामले की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय भाजपा विधायक दिनेश राय ने अस्पताल का औचक निरीक्षण किया और डॉक्टरों की गैरमौजूदगी पर सवाल उठाते हुए मुख्यमंत्री व कलेक्टर से शिकायत की बात कही। वहीं, सिविल सर्जन डॉ. विनोद कुमार नावकर ने सफाई देते हुए कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले कई बच्चे समय से पहले (6-8 महीने में) पैदा होते हैं और कम वजन व ‘एस्फिक्सिया इंजरी’ से पीड़ित होते हैं। उन्होंने बताया कि छह महीनों में 1,188 बच्चों में से 642 कम वजन के थे, जिनमें से 60 को बचाया नहीं जा सका।

मृत्यु दर और मेडिकल कॉलेज के सहयोग पर स्थिति

सिविल सर्जन ने दावा किया कि WHO और सरकार के 10 प्रतिशत के स्वीकृत मॉर्टेलिटी रेट के मुकाबले उनके अस्पताल की मृत्यु दर 7.5 प्रतिशत है, जो जबलपुर संभाग के अन्य जिलों की तुलना में बेहतर है। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि जिला अस्पताल सिवनी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध है, लेकिन मेडिकल कॉलेज के शिशु रोग विभाग का ड्यूटी रोस्टर न बनने के कारण डॉक्टरों का अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पा रहा है। हालांकि इन तर्कों के बावजूद 3 महीने में 46 नवजातों की मौत ने स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

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