FSSAI Action: भारत के करीब ₹200 लाख करोड़ के कंज्यूमर बाजार में खाद्य सुरक्षा को लेकर निगरानी बढ़ गई है। भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण (FSSAI) पनीर से लेकर शराब की बोतलों तक की जांच कर रहा है। रेस्टोरेंट की साफ-सफाई, खाद्य भंडारण और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बिकने वाले सामान भी जांच के दायरे में हैं। जानकारों के मुताबिक, इससे कंपनियों की कमाई पर तुरंत बड़ा असर भले न दिखे, लेकिन कारोबार की लागत बढ़ सकती है।
बड़ी कंपनियों पर ज्यादा दबाव
एलाने कैपिटल के विशेषज्ञों का मानना है कि नए नियमों के कारण बड़ी कंपनियों को ज्यादा परेशानी हो सकती है, जबकि डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर ब्रांड्स तेजी से खुद को नए मानकों के मुताबिक ढाल सकते हैं। नकली पनीर के खिलाफ कार्रवाई से उपभोक्ता बेहतर और भरोसेमंद डेयरी कंपनियों की ओर भी रुख कर सकते हैं।
शराब कंपनियों पर कार्रवाई से बढ़ी मुश्किल
FSSAI की सख्ती का बड़ा असर शराब कारोबार पर भी दिखाई दिया है। अगस्त में यूनाइटेड स्पिरिट्स की बेंगलुरु फैसिलिटी से करीब 18 हजार पेटियां जब्त की गईं। कार्रवाई पुरानी बोतलों के दोबारा इस्तेमाल से जुड़े नियमों का पालन नहीं करने के मामले में हुई। इसका असर स्मिरनॉफ, डीएसपी ब्लैक डीलक्स और वैट 69 जैसे ब्रांड्स पर पड़ा। कुछ व्हिस्की और रम ब्रांड्स में फ्लेवर मिलाने को लेकर भी सवाल उठे हैं।
ब्रांड्स को बदलने पड़ रहे हैं फॉर्मूले
नियामक की सख्ती के बाद यूनाइटेड स्पिरिट्स को अपने कई प्रमुख ब्रांड्स के फॉर्मूले में बदलाव करना पड़ रहा है। पेरनोड रिकार्ड की फैसिलिटी का भी निरीक्षण किया गया है। ऐसे मामलों में कंपनियों का कानूनी खर्च बढ़ रहा है, जिससे उनके कारोबार की लागत पर असर पड़ सकता है।
FMCG कंपनियों के दावों की जांच
रोजमर्रा की जरूरतों का सामान बनाने वाली एफएमसीजी कंपनियां भी जांच के दायरे में हैं। नियामक उन उत्पादों की खास तौर पर पड़ताल कर रहा है जो सौ फीसदी शुद्ध होने का दावा करते हैं। कार्रवाई के बाद एमवे इंडिया, इमामी, बॉन बिस्कुट और अपीस इंडिया को अपने दावे वापस लेने पड़े हैं। डाबर, फर्न्स एन पेटल्स और लोटे इंडिया को नोटिस मिलने के बाद सुधारात्मक कदम उठाने पड़े।
पैकेजिंग और टेस्टिंग का बढ़ेगा खर्च
कंपनियों के लिए ‘नेचुरल’ और ‘प्रीमियम’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल भी अब पहले जितना आसान नहीं होगा। बाजार में नया उत्पाद उतारने से पहले कंपनियों को टेस्टिंग और पैकेजिंग पर ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है। इससे उत्पाद तैयार करने की कुल लागत बढ़ने की आशंका है।
जांच के घेरे में पिज्जा-बर्गर आउटलेट्स
खाने-पीने के आउटलेट्स पर भी कार्रवाई तेज हुई है। खराब चिकन की शिकायत के बाद मंगलुरु में एक केएफसी आउटलेट सील किया गया। जांच के दौरान वहां एक्सपायरी डेट वाला कुकिंग ऑयल भी मिला। महाराष्ट्र में राज्य खाद्य विभाग ने जुबिलेंट फूडवर्क्स के चार डोमिनोज आउटलेट्स और सैफायर फूड्स के एक पिज्जा हट आउटलेट का लाइसेंस सस्पेंड किया। वहां साफ-सफाई और खाद्य भंडारण से जुड़ी गंभीर कमियां मिली थीं।
ऑनलाइन डिलीवरी कंपनियां भी रडार पर
अमेज़न, स्विगी इंस्टामार्ट, बिगबास्केट, फ्लिपकार्ट इंडिया और जेप्टो जैसे ऑनलाइन डिलीवरी प्लेटफॉर्म भी निगरानी के दायरे में हैं। इन प्लेटफॉर्म्स पर खराब खाद्य सामग्री बेचने के आरोप लगे हैं। ऐसे में खाद्य सुरक्षा नियमों का पालन सुनिश्चित करने का दबाव इन कंपनियों पर भी बढ़ रहा है।
आखिर बोझ किसकी जेब पर पड़ेगा?
मार्किट एक्सपर्ट्स के अनुसार, शुरुआती दौर में टेस्टिंग और कानूनी फीस जैसी बढ़ी लागत कंपनियां वहन करेंगी। लेकिन लंबे समय में कंपनियां बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा उत्पादों की कीमत बढ़ाकर ग्राहकों पर डाल सकती हैं। यानी सुरक्षित और मानकों के अनुरूप भोजन के लिए उपभोक्ताओं को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है। वहीं, छोटे कारोबारी कड़े मानकों को पूरा नहीं कर पाए तो उनके बाजार से बाहर होने का जोखिम भी बढ़ सकता है।
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