Muzaffarnagar Riots: पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में 2013 में हुए सांप्रदायिक दंगों की आज बरसी है। करीब 13 साल पहले हुई इस हिंसा के दौरान सामने आए गैंगरेप के एक मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस मामले में करीब नौ साल तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद 2023 में विशेष पॉक्सो अदालत ने दो जीवित आरोपियों को 20-20 साल की सजा सुनाई थी। तीसरे आरोपी की मुकदमे की सुनवाई के दौरान मौत हो गई थी।
दंगे के बीच महिला के साथ हुई थी दरिंदगी
दंगों के दौरान शामली जिले के फुगाना थाना क्षेत्र के लांख गांव में लाखों घर जला दिए गए थे। इसी हिंसा के बीच एक महिला अपने परिवार के साथ जान बचाकर भाग रही थी। इसी दौरान उसके साथ गैंगरेप की वारदात हुई।
जान बचाने के लिए परिवार से अलग हुई महिला
हिंसा से बचने के लिए महिला अपने छोटे बेटे के साथ घर से निकली थी। अफरा-तफरी के बीच वह परिवार के बाकी लोगों से अलग हो गई। इसी दौरान आरोपियों ने उसे पकड़ लिया और उसके साथ गैंगरेप किया। मामले की जांच के बाद तीन आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई हुई।
2023 में दो दोषियों को हुई 20-20 साल की सजा
विशेष पॉक्सो अदालत ने 2023 में तीन आरोपियों को दोषी ठहराया था। इनमें से एक आरोपी की पहले ही मौत हो चुकी थी। जीवित बचे दोनों दोषियों को अदालत ने 20-20 साल की सजा सुनाई और उन पर 15-15 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई में देरी पर जताई थी नाराजगी
गैंगरेप का मामला फास्ट ट्रैक अदालत में चल रहा था, लेकिन सुनवाई लगातार धीमी रही। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने मामले की सुनवाई में हो रही देरी पर हैरानी जताई थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद विशेष पॉक्सो अदालत में मामले की रोजाना सुनवाई शुरू हुई।
मुकदमा वापस लेने के लिए बनाया गया दबाव
पीड़ित पक्ष का दावा था कि उन पर मुकदमा वापस लेने के लिए दबाव बनाया गया। परिवार को जान से मारने की धमकियां मिलीं और पैसों का लालच भी दिया गया। पीड़िता ने BBC को बताया था कि, “हम पर मुक़दमा वापस लेने का दबाव बनाया गया। पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी दी गई। पैसे का भी प्रलोभन दिया गया। वो लोग हमारे इस नए घर तक आ गए, जो हमने मुआवजे के पैसे से बनाया था। हमने तीन साल तक वो भी घर छोड़कर रखा और दिल्ली में छिपकर रहे। साल 2019 में हम लोग वापस आए।”
तीन साल तक दिल्ली में छिपकर रहा परिवार
पीड़िता के मुताबिक, परिवार ने अपनी सुरक्षा के लिए मुजफ्फरनगर छोड़ दिया था। वे करीब तीन साल तक दिल्ली में छिपकर रहे। मुआवजे की रकम से बनाए गए नए घर को भी उन्हें छोड़ना पड़ा। परिवार 2019 में वापस लौटा।
कवाल हत्याकांड के बाद बढ़ा था सांप्रदायिक तनाव
मुजफ्फरनगर और आसपास के इलाकों में सितंबर 2013 की हिंसा से पहले 27 अगस्त को कवाल गांव में शाहनवाज की हत्या हुई थी। इसके बाद सचिन और गौरव नाम के दो युवकों की हत्या से तनाव और बढ़ गया। अलग-अलग जगह पंचायतें हुईं और राजनीतिक व सामाजिक बयानबाजी तेज हो गई।
महापंचायत के बाद कई इलाकों में फैली हिंसा
7 सितंबर को नंगला मंदौड़ में महापंचायत के बाद बड़ी संख्या में लोग अपने गांव लौट रहे थे। इसी दौरान बसी कलां समेत कई जगह विवाद, पथराव और हिंसा हुई। इसके बाद मीरापुर क्षेत्र के मुझेड़ा, पुरबालियान और जौली गंगनहर सहित कई इलाकों में हिंसा फैल गई। बाद में भौराकलां, शाहपुर, तितावी, बुढ़ाना, फुगाना और भोपा थाना क्षेत्रों में भी हालात बिगड़ गए।
60 से ज्यादा लोगों की हुई थी मौत
मुजफ्फरनगर दंगों में सरकारी और सार्वजनिक रिकॉर्ड के मुताबिक 60 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। बड़ी संख्या में लोगों को अपना घर-बार छोड़कर राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी। हिंसा पर नियंत्रण के लिए सेना की मदद भी ली गई थी।
13 साल बाद भी याद की जाती है वो हिंसा
2013 के मुजफ्फरनगर दंगे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुए सबसे गंभीर सांप्रदायिक तनाव की घटनाओं में गिने जाते हैं। दंगों के दौरान हुआ यह गैंगरेप मामला भी उन घटनाओं में शामिल है, जिसकी कानूनी लड़ाई लंबे समय तक चली और आखिरकार 2023 में दो दोषियों को सजा हुई।
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