तिब्बत में पिछले महीने 22 अक्टूबर को आए 7.0 तीव्रता के विनाशकारी भूकंप के बाद अब धरती की सतह पर इसके खौफनाक और गहरे जख्म सामने आए हैं। वैज्ञानिकों ने भूकंप के केंद्र से करीब 15 किलोमीटर के दायरे में जमीन के फटने, खिसकने और सतह में भारी बदलाव के स्पष्ट संकेत खोज निकाले हैं। अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण के अनुसार, इस भीषण भूकंप का केंद्र चीन के तिब्बत क्षेत्र स्थित नागचू शहर से लगभग 191 किलोमीटर पूर्व-उत्तर-पूर्व में, जमीन से 18 किलोमीटर की गहराई में स्थित था।
जमीन के स्तर में 3.5 मीटर का अंतर और 0.9 मीटर खिसकाव
वैज्ञानिकों की जांच में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। प्रभावित क्षेत्र में कुछ जगहों पर जमीन के स्तर में लगभग 3.5 मीटर तक का भारी अंतर या धंसाव देखा गया है। इसके अलावा, कुछ हिस्सों में पूरी की पूरी जमीन बाईं ओर करीब 0.9 मीटर तक खिसक गई है। पूरे इलाके में जमीन का यह विस्थापन एक समान नहीं है, बल्कि अलग-अलग जगहों पर इसके अलग-अलग गंभीर प्रभाव दर्ज किए गए हैं, जिसे तकनीकी भाषा में ‘सरफेस रप्चर’ कहा जाता है।
दरारों के बीच सैंड लिक्विफैक्शन और पानी भरने का खतरा
भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में जमीन पर चौड़ी दरारें पड़ने के साथ-साथ रेत में पानी भरने यानी ‘सैंड लिक्विफैक्शन’ के संकेत भी मिले हैं। अत्यधिक तेज झटकों के कारण जमीन के भीतर मौजूद पानी का दबाव अचानक बढ़ जाता है, जिससे रेत अपनी मजबूती खो देती है और कई जगहों पर पानी व कीचड़ सतह पर बाहर आ जाते हैं। इस तरह की स्थिति से वहां मौजूद इमारतों और अन्य बुनियादी संरचनाओं को भारी क्षति पहुंचने का गंभीर खतरा पैदा हो जाता है।
सामान्य फॉल्टिंग और टेक्टोनिक प्लेटों के खिंचाव से आया भूकम्प
वैज्ञानिकों के विश्लेषण के अनुसार, इस भूकंप के पीछे मुख्य वजह पृथ्वी की ऊपरी परत में पैदा हुआ खिंचाव था, जिसे ‘नॉर्मल फॉल्टिंग’ कहा जाता है। जब चट्टानों में इस तरह का तनाव पैदा होता है, तो एक हिस्सा दूसरे के मुकाबले नीचे खिसक जाता है, जिससे भारी ऊर्जा रिलीज होती है। तिब्बत का यह पूरा भू-भाग भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों की निरंतर हलचल से जुड़ा है, जिनके आपस में टकराने से ही हिमालय और तिब्बती पठार का निर्माण हुआ है। प्लेटों के इसी दबाव के कारण इस क्षेत्र में अक्सर इस तरह के खतरनाक भूकंप आते रहते हैं।
भूवैज्ञानिकों के लिए क्यों बेहद अहम है यह खोज?
जमीन पर उभरे इन निशानों और दरारों के अध्ययन से वैज्ञानिकों को यह गहराई से समझने में मदद मिल रही है कि भूकंप के दौरान ठीक क्या प्रक्रियाएं घटित हुईं। इससे भूवैज्ञानिकों को यह सटीक आकलन करने में सहायता मिलेगी कि फॉल्ट लाइन के किस हिस्से में कितना तनाव उत्पन्न हुआ और उसका प्रभाव सतह तक कैसे पहुंचा। आगे की जांच से यह भी पता लगाया जा रहा है कि यह दरारें कितने बड़े इलाके में फैली हैं।
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