कर्नाटक हाई कोर्ट ने बैंक खातों को फ्रीज करने को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि पुलिस भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 106 के तहत किसी अपराध की जांच के दौरान ऐसे बैंक खाते को डेबिट-फ्रीज कर सकती है, जिसमें मौजूद रकम के अपराध से जुड़े होने का संदेह हो। इसके लिए पहले से अदालत की अनुमति लेना जरूरी नहीं है।
कोर्ट की अनुमति लेना जरूरी नहीं
जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की अध्यक्षता वाली कर्नाटक हाई कोर्ट की बेंच ने कहा कि अगर जांच के दौरान पुलिस को किसी बैंक खाते में जमा रकम के अपराध से जुड़े होने का संदेह है, तो वह खाते से पैसे निकालने या ट्रांसफर करने पर रोक लगा सकती है। हालांकि, पुलिस को इस कार्रवाई की जानकारी संबंधित क्षेत्र के मजिस्ट्रेट को देनी होगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 106 के तहत खाते को अस्थायी रूप से फ्रीज करने के लिए पहले से न्यायिक आदेश जरूरी नहीं है।
धारा 106 और 107 में कोर्ट ने बताया अंतर
हाई कोर्ट ने BNSS की धारा 106 और 107 के बीच अंतर भी बताया है। अदालत के मुताबिक, धारा 106 का इस्तेमाल जांच के दौरान संदिग्ध रकम या संपत्ति को सुरक्षित रखने के लिए किया जा सकता है, ताकि उसे निकालकर या ट्रांसफर करके गायब न किया जा सके। वहीं धारा 107 के तहत संपत्ति की औपचारिक कुर्की और जब्ती की प्रक्रिया आती है। इसमें वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की मंजूरी, अदालत में आवेदन, संबंधित व्यक्ति को नोटिस और न्यायिक सुनवाई जैसी प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। अदालत ने कहा कि बैंक खाते को धारा 106 के तहत अस्थायी रूप से फ्रीज करना और धारा 107 के तहत संपत्ति की औपचारिक कुर्की दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं।
किस मामले में आया फैसला?
यह मामला बेंगलुरु के कोरमंगला पुलिस स्टेशन में दर्ज क्राइम नंबर 25/2026 से जुड़ा था। जांच JAR Gold Retail Private Limited से संबंधित थी और इसमें अनरेगुलेटेड डिपॉजिट स्कीम्स (BUDS) एक्ट, 2019 के तहत कार्रवाई की जा रही थी। निचली अदालत ने जब्त सोना-चांदी वापस करने और कुछ बैंक खातों को डी-फ्रीज करने का निर्देश दिया था। इसके खिलाफ मामला हाई कोर्ट पहुंचा। कर्नाटक हाई कोर्ट ने निचली अदालत के इन आदेशों को रद्द कर दिया और धारा 106 के तहत पुलिस की ओर से की गई कार्रवाई को सही माना।
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