इसरो के LVM3-M5 रॉकेट(ISRO’s LVM3) का C25 अपर स्टेज करीब नौ महीने अंतरिक्ष में रहने के बाद 30 जुलाई 2026 को पृथ्वी के वायुमंडल में वापस आ गया। इस रॉकेट को 2 नवंबर 2025 को श्रीहरिकोटा से CMS-03 कम्युनिकेशन सैटेलाइट को लॉन्च करने के लिए भेजा गया था। सैटेलाइट को उसकी निर्धारित जियोस्टेशनरी ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में पहुंचाने के बाद C25 स्टेज का मुख्य काम पूरा हो गया था। सैटेलाइट को कक्षा में स्थापित करने के बाद इसरो ने C25 स्टेज को पैसिवेट किया। इसका मतलब था कि स्टेज में बची ऊर्जा और अन्य संभावित जोखिमों को कम किया गया ताकि वह अंतरिक्ष में अनियंत्रित तरीके से टूटे नहीं।
अटलांटिक महासागर के ऊपर पहुंचने की थी संभावना
इसके बाद इसे करीब 21 डिग्री झुकी हुई लंबी और अंडाकार कक्षा में रखा गया। इससे स्टेज के अंतरिक्ष में लंबे समय तक बने रहने की संभावना कम हुई और उसकी नियंत्रित री-एंट्री की योजना बनाई जा सकी। इसरो के मुताबिक, C25 स्टेज ने 30 जुलाई को शाम करीब 5:38 बजे IST पर वायुमंडल में प्रवेश किया। इसके अटलांटिक महासागर के ऊपर पहुंचने की संभावना थी। वातावरण में तेज गति से प्रवेश के दौरान पैदा हुई अत्यधिक गर्मी के कारण रॉकेट का अधिकांश हिस्सा जलकर नष्ट हो गया।
लगातार रखी गई नजर
C25 की निगरानी इसरो के सिस्टम फॉर सेफ एंड सस्टेनेबल स्पेस ऑपरेशंस मैनेजमेंट (IS4OM) के साथ-साथ अमेरिकी स्पेस कमांड ने भी की। श्रीहरिकोटा स्थित मल्टी-ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग रडार ने भी इसके अंतिम ऑर्बिटल चरणों में इसे ट्रैक किया।
इसरो ने पहले अनुमान लगाया था कि C25 स्टेज एक साल से कम समय तक कक्षा में रहेगा। वास्तव में इसकी ऑर्बिटल लाइफ नौ महीने से भी कम रही। यह पूरी प्रक्रिया अंतरिक्ष में छोड़े गए रॉकेट के हिस्सों को सुरक्षित तरीके से हटाने और अंतरिक्ष मलबे के जोखिम को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जाती है।