अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने के अपने फैसले को फिलहाल टाल दिया है। ट्रंप प्रशासन ने ‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट’ के प्रावधानों को अस्थायी रूप से हटाते हुए 60 दिनों की समीक्षा अवधि की घोषणा की है। यह भारी-भरकम टैरिफ 18 अक्टूबर से ही प्रभावी होना था, लेकिन ऐन वक्त पर आए इस आदेश से भारत और चीन जैसे देशों को बिना किसी दंड या रोक-टोक के रूस से कच्चे तेल का आयात जारी रखने की अनुमति मिल गई है।
अमेरिका और यूक्रेन में फैसले का विरोध
वाशिंगटन में इस फैसले को लेकर राजनीतिक खींचतान शुरू हो गई है। डेमोक्रेटिक सीनेटर एलिजाबेथ वॉरेन और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने इस ढील की कड़ी आलोचना की है। उनका तर्क है कि इससे रूस की सैन्य फंडिंग को बल मिल रहा है। हालांकि, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि वैश्विक बाजार में ईरान, सऊदी अरब (हूती हमले) और यूक्रेन युद्ध के कारण आपूर्ति बाधित है। ऐसे हालात में अचानक रूसी तेल पर रोक लगाने से वैश्विक ईंधन कीमतें आसमान छू सकती थीं।
भारतीय रिफाइनरियों और अर्थव्यवस्था के लिए राहत
भारत के दृष्टिकोण से यह फैसला बेहद अहम है। अमेरिकी विदेश मंत्री ने भी माना कि भारत अपनी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाए बिना रातों-रात रूसी ऊर्जा स्रोतों से नाता नहीं तोड़ सकता। इस अस्थायी छूट से भारतीय रिफाइनरों को रियायती दर पर कच्चा तेल मिलता रहेगा। इसके साथ ही, यह नरमी दोनों देशों के बीच भविष्य के व्यापार समझौतों (ट्रेड डील) के लिहाज से भी सकारात्मक संकेत मानी जा रही है, जिससे फिलहाल व्यापारिक तनाव टल गया है।
भविष्य में फिर गहरा सकता है संकट
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) और उद्योग के अन्य विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि यह कोई दीर्घकालिक नीतिगत बदलाव नहीं है, बल्कि एक अस्थाई राहत मात्र है। 60 दिन की यह समीक्षा अवधि पूरी होने के बाद अमेरिकी प्रशासन कभी भी नियमों में बदलाव कर सकता है। इस अनिश्चितता के कारण भारतीय ऊर्जा आयातकों पर तलवार लटकी हुई है, और आने वाले समय में देश को एक बार फिर से तेल आयात से जुड़े कड़े संकट का सामना करना पड़ सकता है।
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