NEET पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था में पाई गई गड़बड़ियों के खिलाफ शुरू हुआ युवा आंदोलन(CJP movement) 25 जुलाई को एक बड़े राजनीतिक मोड़ पर पहुंच गया जब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया। इस आंदोलन से जुड़े युवाओं ने इसे अपनी बड़ी जीत बताया है। हालांकि CJP (Cockroach Janta Party) ने कहा कि अभी कई मांगें पूरी होना बाकी हैं।
यह कहानी सिर्फ एक इस्तीफे की नहीं है बल्कि उस आंदोलन की है जो सोशल मीडिया के गुस्से से शुरू होकर सड़कों तक पहुंचा और जिसने युवाओं की परीक्षा व्यवस्था, जवाबदेही और न्याय की मांग को राष्ट्रीय बहस बना दिया।
कैसे हुई CJP की शुरुआत ?
CJP यानी Cockroach Janta Party की शुरुआत 16 मई 2026 को अभिजीत दिपके ने की थी। दिपके एक राजनीतिक संचार रणनीतिकार हैं जो पहले आम आदमी पार्टी के साथ काम कर चुके हैं।
इस आंदोलन का नाम खुद में एक व्यंग्य था। “Cockroach” शब्द के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की गई कि आम युवा और आम नागरिकों को अक्सर व्यवस्था में नजरअंदाज किया जाता है। शुरुआत में यह एक डिजिटल अभियान था जिसमें मीम, वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए सवाल उठाए गए।

NEET पेपर लीक ने युवाओं में फूटा गुस्सा
आंदोलन की असली वजह NEET परीक्षा में पेपर लीक और गड़बड़ी के आरोप बने। हजारों छात्रों को लगा कि सालों की मेहनत, कोचिंग और त्याग के बाद भी उनका भविष्य एक खराब परीक्षा व्यवस्था के कारण प्रभावित हो गया। युवाओं का सवाल था अगर देश की सबसे बड़ी परीक्षाएं भी भरोसेमंद नहीं रहेंगी तो मेहनत और योग्यता का मूल्य क्या रह जाएगा? CJP ने इसी नाराजगी को आसान भाषा, व्यंग्य और डिजिटल कंटेंट के जरिए लोगों तक पहुंचाया। देखते ही देखते बड़ी संख्या में युवा इस अभियान से जुड़ने लगे।
सोशल मीडिया से जंतर-मंतर तक पहुंचा आंदोलन
CJP की सबसे बड़ी ताकत युवाओं की डिजिटल भागीदारी बनी। वीडियो, मीम और ऑनलाइन अभियानों ने इसे तेजी से फैलाया। इसके बाद आंदोलन सिर्फ इंटरनेट तक सीमित नहीं रहा और छात्र दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचने लगे।
![]()
प्रदर्शनकारियों ने परीक्षा लीक की निष्पक्ष जांच, जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई, छात्रों के साथ न्याय और परीक्षा प्रणाली में सुधार जैसी मांगें उठाईं। जंतर-मंतर पर छात्रों ने धरना दिया, अपनी कहानियां साझा कीं और लंबे समय तक प्रदर्शन जारी रखने के लिए भोजन, पानी और दूसरी जरूरी व्यवस्थाएं खुद संभालीं।
सोनम वांगचुक के साथ से मिली हिम्मत
जब शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक आंदोलन के समर्थन में आए तो इसे और मजबूती मिली। उन्होंने इसे सिर्फ परीक्षा विवाद नहीं, बल्कि युवाओं के भरोसे और लोकतांत्रिक जवाबदेही का मुद्दा बताया।

28 जून को उन्होंने समर्थन में भूख हड़ताल शुरू की। उनके सत्याग्रह ने आंदोलन को एक नया नैतिक समर्थन दिया और देशभर में इसकी चर्चा बढ़ी।
“चलो संसद” मार्च और बढ़ाया दबाव
संसद सत्र के दौरान CJP ने जंतर-मंतर से संसद तक “चलो संसद” मार्च का आह्वान किया। हालांकि पुलिस ने सुरक्षा कारणों से इसकी अनुमति नहीं दी।


