मिडिल ईस्ट में यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा मिसाइल और ड्रोन हमले तेज किए जाने के बाद तनाव चरम पर पहुंच गया है। सऊदी अरब के हवाई अड्डों और तेल ठिकानों पर बढ़ते हमलों के बीच पाकिस्तान ने अपने पुराने सहयोगी की सुरक्षा के लिए सेना भेजने की पुष्टि की है। फील्ड मार्शल और चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज आसिम मुनीर के नेतृत्व में पाकिस्तानी सैनिक पहले से सऊदी में मौजूद हैं। अक्टूबर 2026 की शुरुआत में रियाद में हुई आपातकालीन बैठक के बाद पाकिस्तान, सऊदी और तुर्की के मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट को सक्रिय कर दिया गया है। पाकिस्तानी सैन्य प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने स्पष्ट किया है कि सऊदी अरब की रक्षा के लिए उनका सैन्य सहयोग पूर्ण और बिना शर्त है।
हूतियों की चुनौती और पाकिस्तानी सेना का संकट
लगभग 6 लाख 60 हजार सक्रिय सैनिकों और परमाणु हथियारों से लैस पाकिस्तानी सेना भले ही दुनिया की बड़ी ताकतों में गिनी जाती हो, लेकिन हूतियों से निपटना आसान नहीं होगा। हूती विद्रोही पारंपरिक युद्ध के बजाय सस्ते ड्रोन, बैलिस्टिक मिसाइल और छापामार रणनीति से हमला करते हैं। दूसरी ओर, कई सैन्य विश्लेषक पाकिस्तानी सेना को आंतरिक मोर्चों पर फंसा हुआ और वित्तीय रूप से पस्त बता रहे हैं। 2026 में सुरक्षा बलों के भारी नुकसान, आतंकवाद सूचकांक में बढ़ोतरी, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में उग्रवाद, अफगानिस्तान सीमा पर तनाव और चरमराती अर्थव्यवस्था के कारण पाकिस्तानी सेना पर पहले से ही भारी दबाव बना हुआ है।
आसिम मुनीर की कूटनीति और बड़ा जोखिम
सऊदी अरब की मदद करने के साथ ही फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने ईरान से भी संपर्क साधा है ताकि कूटनीतिक रास्ते से हूतियों को नियंत्रित किया जा सके। हालांकि, अगर यमन के अंदर सीधा सैन्य संघर्ष शुरू होता है तो पाकिस्तान को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। हूतियों ने भी चेतावनी दी है कि पाकिस्तान और तुर्की का हस्तक्षेप उन्हें सीधा निशाना बनाएगा। अपने ही देश में अंदरूनी उग्रवाद और आर्थिक बदहाली से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए विदेश में बहु-मोर्चा युद्ध लड़ना एक बेहद खतरनाक और आत्मघाती कदम साबित हो सकता है।
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