Jagannath Rath Yatra Wheels: ओडिशा के पुरी में आयोजित भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा केवल नौ दिनों की यात्रा नहीं, बल्कि इसके समापन के बाद भी कई अहम धार्मिक परंपराएं निभाई जाती हैं। आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से शुरू होकर बहुड़ा यात्रा तक चलने वाली इस यात्रा को सनातन परंपरा में बहुत पवित्र माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि रथयात्रा में शामिल होने वाला श्रद्धालु जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर बैकुंठ धाम की प्राप्ति का अधिकारी बनता है। ऐसे में कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि यात्रा खत्म होने के बाद भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के विशाल रथों का क्या किया जाता है।
हर साल नए रथों का होता है निर्माण
मंदिर परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष, भगवान बलभद्र का तालध्वज और देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ हर साल नई लकड़ियों से तैयार किया जाता है। तीनों रथों की बनावट, ऊंचाई और पहियों की संख्या भी अलग-अलग होती है। भगवान जगन्नाथ के नंदीघोष रथ में 16 पहिए, भगवान बलभद्र के तालध्वज रथ में 14 पहिए और देवी सुभद्रा के दर्पदलन रथ में 12 पहिए लगाए जाते हैं। अगले साल फिर से नए रथ बनाए जाने के कारण पुराने रथों को धार्मिक विधि-विधान के साथ सावधानीपूर्वक अलग कर दिया जाता है।
रथ की लकड़ी को क्यों माना जाता है पवित्र
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जिन रथों पर भगवान के विग्रह विराजमान होते हैं, उनकी लकड़ी बहुत पवित्र मानी जाती है। यही वजह है कि इन्हें सामान्य लकड़ी की तरह उपयोग नहीं किया जाता। रथ से निकाली गई लकड़ियों का इस्तेमाल श्री जगन्नाथ मंदिर की धार्मिक जरूरतों, यज्ञ, हवन और दूसरे पारंपरिक अनुष्ठानों में किया जाता है। कई बार इन्हीं लकड़ियों से पूजा से जुड़े स्मृति-चिह्न और धार्मिक सामग्री भी तैयार की जाती है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि घर में रथ की पवित्र लकड़ी स्थापित करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और भगवान जगन्नाथ की विशेष कृपा मिलती है।
श्रद्धालु भी प्राप्त कर सकते हैं रथ के पवित्र हिस्से
रथयात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के रथों के कुछ हिस्से श्रद्धालुओं के लिए भी उपलब्ध कराए जाते हैं। समय-समय पर मंदिर प्रशासन या संस्थाओं के माध्यम से रथ की लकड़ी से बने स्मृति-चिह्न, पूजा सामग्री और अन्य धार्मिक वस्तुएं भक्तों को दी जाती हैं। इसके अलावा रथ के कुछ हिस्सों को नीलामी प्रक्रिया के जरिए भी पाया जा सकता है। इनमें रथ के पहियों की सबसे अधिक मांग रहती है और नीलामी में इन्हीं पर सबसे ज्यादा बोली लगाई जाती है। रथयात्रा पूरी होने के बाद रथों को अलग कर उनके हिस्सों को पुरी स्थित मंदिर कार्यालय के भंडार कक्ष में सुरक्षित रखा जाता है, जहां से आगे की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
ऐसे होती है पवित्र लकड़ियों की नीलामी
रथ के पहियों, प्रभा और अन्य लकड़ी के हिस्सों के वितरण के लिए श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA) हर साल एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रक्रिया (SOP) और शुरुआती बेस प्राइस तय करता है। जो श्रद्धालु या संस्थाएं इन पवित्र हिस्सों को प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) के माध्यम से आवेदन करना होता है। सबसे अधिक बोली लगाने वाले आवेदक को यह अवसर मिलता है। कुछ मामलों में श्रद्धालु टोकन राशि या निर्धारित मूल्य से अधिक दान देकर भी इन पवित्र लकड़ियों को प्राप्त कर सकते हैं।
लकड़ी लेने वालों को निभानी होती हैं ये शर्तें
रथ की पवित्र लकड़ियां प्राप्त करने वाले श्रद्धालुओं या संस्थाओं को मंदिर प्रशासन के समक्ष लिखित शपथ पत्र देना होता है। इसमें यह वादा करना जरुरी होता है कि इन पवित्र लकड़ियों का किसी भी प्रकार से अनादर या व्यावसायिक दुरुपयोग नहीं किया जाएगा और उनका उपयोग केवल श्रद्धा एवं धार्मिक सम्मान के साथ किया जाएगा।
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