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सुप्रीम कोर्ट ने फ्यूल नोजल और इनवॉइस पर इथेनॉल की मात्रा का लेबल अनिवार्य करने की मांग वाली PIL पर सुनवाई से किया इनकार 

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक PIL पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। इस PIL में केंद्र और अन्य लोगों को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि पेट्रोल पंपों पर हर डिस्पेंसिंग नोजल पर अनिवार्य और एक जैसा लेबल लगाया जाए, जिसमें पेट्रोल में इथेनॉल की सही मात्रा बताई गई हो। जस्टिस एमएम सुंदरेश और पीबी वराले की बेंच ने कहा कि वे आर्टिकल 32 के तहत इस PIL पर सुनवाई नहीं करेंगे और याचिकाकर्ता नरेंद्र कुमार गोस्वामी राहत के लिए संबंधित हाई कोर्ट जा सकते हैं।

केंद्र की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा कि यह एक प्रॉक्सी लिटिगेशन है क्योंकि इसी तरह के मुद्दे पर एक याचिका कोर्ट पहले ही खारिज कर चुका है। AG ने कहा, “याचिकाकर्ता चाहता है कि भारत सरकार उसे जवाब दे।”

गोस्वामी ने तर्क दिया कि उन्हें यह जानने का अधिकार है कि फ्यूल पंपों पर दिए जाने वाले पेट्रोल में क्या-क्या है। उन्होंने कहा, “सिर्फ मुझे ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों को भी उन्हें दिए जाने वाले फ्यूल के कंपोजिशन के बारे में जानकारी होनी चाहिए।” बेंच ने खुद पेश हुए गोस्वामी से कहा कि वे अपनी बात हाई कोर्ट के सामने रखें।

इथेनॉल की मात्रा साफ-साफ लिखी हो

गोस्वामी ने यह निर्देश देने की भी मांग की है कि हर फ्यूल इनवॉइस में बेचे गए पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा साफ-साफ लिखी होनी चाहिए। उनकी याचिका में कहा गया है, “प्रतिवादियों को निर्देश दिया जाए कि वे एक तय समय में एक ऑफिशियल, पब्लिक और व्हीकल-वाइज कम्पैटिबिलिटी डेटाबेस तैयार करें और पब्लिश करें। इसे मैन्युफैक्चरर, मॉडल, इंजन टाइप और मैन्युफैक्चरिंग ईयर के आधार पर सर्च किया जा सके और इसमें हर गाड़ी के लिए अलग-अलग इथेनॉल ब्लेंड की उपयुक्तता या अनुपयुक्तता बताई गई हो।” इसमें एक स्वतंत्र एक्सपर्ट कमेटी बनाने की भी मांग की गई है। इस कमेटी में पेट्रोलियम और नेचुरल गैस मंत्रालय, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स और अन्य के प्रतिनिधि शामिल हों।

यह कमेटी मौजूदा गाड़ियों पर E20 की असल कम्पैटिबिलिटी की जांच करे और पब्लिक रिपोर्ट सौंपे। याचिका में कहा गया है कि कमेटी को फ्यूल एफिशिएंसी, इंजन की उम्र और मेंटेनेंस कॉस्ट, वारंटी और इंश्योरेंस पर असर, नेट एनवायरनमेंटल फुटप्रिंट (जिसमें टेल-पाइप एमिशन और इथेनॉल प्रोडक्शन से जुड़ा पानी का इस्तेमाल शामिल हो) और ब्लेंडिंग प्रोग्राम से कथित तौर पर पैदा होने वाली फूड-सिक्योरिटी और फीड-डायवर्जन की चिंताओं पर भी रिपोर्ट देनी चाहिए।

 

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