सरकार द्वारा पेश किए गए नए यूपीआई (UPI) ढांचे के बाद भी आम उपयोगकर्ताओं को किसी तरह का अतिरिक्त शुल्क नहीं देना होगा। देश में होने वाले सभी पर्सन-टू-पर्सन (P2P) ट्रांसफर और लगभग 96 प्रतिशत मर्चेंट लेनदेन पूरी तरह से निशुल्क बने रहेंगे। इस नए बदलाव में व्यक्तिगत उपयोग को पूरी तरह से प्रभार-मुक्त रखा गया है, जिससे रोजमर्रा के डिजिटल लेनदेन पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
फ्री ट्रांसफर की सुविधा
उपयोगकर्ताओं के लिए पांच प्रमुख प्रकार के यूपीआई लेनदेन पूरी तरह से मुफ्त रहेंगे। पहला, व्यक्ति से व्यक्ति को भेजे जाने वाले पैसे पर राशि की सीमा के बिना कोई शुल्क या प्लेटफॉर्म फीस नहीं लगेगी। दूसरा, किसी व्यक्ति से पैसे प्राप्त करना भी शून्य शुल्क पर जारी रहेगा, जो कुल यूपीआई लेनदेन मूल्य का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा है। तीसरा, 2,000 रुपये तक के किसी भी मर्चेंट भुगतान पर ग्राहकों से कोई चार्ज नहीं लिया जाएगा। चौथा, स्ट्रीट वेंडर और छोटे दुकानदारों को (जो P2PM श्रेणी के तहत प्रति माह 1 लाख रुपये तक प्राप्त करते हैं) शून्य एमडीआर का लाभ मिलता रहेगा। पांचवां, व्यक्तिगत उपयोग पर कोई मासिक कोटा, सीमित सीमा या छिपा हुआ प्लेटफॉर्म शुल्क लागू नहीं होगा।
व्यापारिक शुल्क का ढांचा
नए नियमों के अनुसार अब शुल्क का दायरा केवल विशिष्ट व्यापारी लेनदेन तक ही सीमित रहेगा। 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा मर्चेंट लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत का मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू होगा, जिसे 75,000 रुपये या उससे अधिक के भुगतानों के लिए अधिकतम 300 रुपये पर सीमित कर दिया गया है। इसके अलावा, रेलवे, ईंधन, बीमा, दूरसंचार और कृषि जैसे आवश्यक क्षेत्रों में 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान पर 5 रुपये का एक समान फिक्स्ड एमडीआर लागू किया गया है।
पूंजी बाजार पर नियम
शेयर बाजार और वित्तीय सेवाओं से जुड़े बड़े भुगतानों के लिए एक अलग श्रेणी तय की गई है। म्युचुअल फंड, प्रतिभूतियों, स्टॉकब्रोकर और डीलरों से संबंधित पूंजी बाजार के भुगतानों पर 0.02 प्रतिशत का एमडीआर लगेगा, जिसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये रखी गई है। इससे बड़े वित्तीय लेनदेन में स्पष्टता और पारदर्शिता बनी रहेगी।
ग्राहकों पर असर नहीं
ग्राहकों को इस नए शुल्क ढांचे से घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे इस फीस का भुगतान नहीं करेंगे। यह एमडीआर शुल्क केवल मर्चेंट-पेमेंट इकोसिस्टम द्वारा वहन किया जाएगा, जिसे बैंकों, भुगतान प्रदाताओं और यूपीआई ऐप के बीच आपस में बांटा जाएगा। बैंकों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे व्यापारियों को यह शुल्क आम ग्राहकों पर डालने से रोकें, ताकि डिजिटल भुगतान की प्रक्रिया पहले की तरह ही सुगम और मुफ्त बनी रहे।
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