हमारे देश में हर माता-पिता का सपना होता है कि उनका बच्चा पढ़कर देश की सबसे प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवा यानी IAS बने। लेकिन, जब एक ही अधिकारी को बार-बार तबादलों का सामना करना पड़े, तो उस परिवार पर क्या गुजरती है? इसका कड़वा सच महाराष्ट्र कैडर के तेजतर्रार 2005 बैच के आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे ने बयां किया है। फिलहाल महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के कमिश्नर के रूप में कार्यरत मुंढे ने हाल ही में कहा कि वे कभी भी अपने बच्चों को सिविल सेवा में जाने की सलाह नहीं देंगे।
5वीं कक्षा से पहले 6 बार बदला स्कूल
एक सरकारी अधिकारी के लगातार ट्रांसफर का असर केवल उसके दफ्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सबसे बड़ा खामियाजा उसके परिवार को उठाना पड़ता है। तुकाराम मुंढे के जीवन में भी यही दर्द देखने को मिला। उनके लगातार तबादलों के कारण उनके बेटे को 5वीं क्लास में पहुंचने से पहले ही 66 बार अपना स्कूल बदलना पड़ा था। एक समिट के दौरान उन्होंने बताया कि बार-बार शहर और स्कूल बदलने से बच्चों के दोस्त छूट जाते हैं और उनकी पढ़ाई पर बुरा असर पड़ता है।
युवाओं के लिए दूसरे बेहतर विकल्प
तुकाराम मुंढे का यह बयान समाज सेवा से मुंह मोड़ने का नहीं है, बल्कि वे मानते हैं कि आज के युवाओं के पास देश को आगे बढ़ाने के लिए सिविल सर्विसेज के अलावा भी कई बेहतरीन रास्ते मौजूद हैं। उनके अनुसार, बिजनेस और पब्लिक लीडरशिप में युवाओं के पास अपनी बात खुलकर रखने और स्वतंत्र रूप से फैसले लेने की अधिक आजादी होती है, जबकि सरकारी नौकरी में कई प्रकार की प्रशासनिक बंदिशें जुड़ी होती हैं।
बेबाक और ईमानदार कार्यशैली का खामियाजा
तुकाराम मुंढे महाराष्ट्र के सबसे सख्त और ईमानदार अफसरों में गिने जाते हैं। वे राजनीतिक दबाव की परवाह किए बिना नियमों का सख्ती से पालन करने के लिए जाने जाते हैं, और यही वजह है कि उनके 21 साल के करियर में अब तक 25 बार तबादले हो चुके हैं। मई 2026 से वे एफडीए कमिश्नर का पद संभालते हुए मिलावटी सामान और असुरक्षित खाद्य पदार्थों के खिलाफ लगातार कड़े कदम उठा रहे हैं। लाल बत्ती और प्रशासनिक पावर की चकाचौंध के पीछे छिपे इस पारिवारिक संघर्ष की कहानी हर उस छात्र के लिए सोचने का विषय है जो सिविल सेवा की तैयारी कर रहा है।
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