हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में पाए जाने वाले कैस्पियन कोबरा के दंश से हुई दो लोगों की मौतों का वैज्ञानिक दस्तावेज पहली बार सामने आया है। Epidemiology International में प्रकाशित अध्ययन में चंबा के दो घातक मामलों के साथ दो ऐसे मामलों का भी जिक्र है, जिनमें पीड़ितों की जान बच गई। रिपोर्ट के लेखक हिमाचल प्रदेश स्वास्थ्य सेवाओं के उपनिदेशक और राज्य महामारी विज्ञानी डॉ. ओमेश कुमार भारती हैं।
2019 में हुई थी चंबा में सांप की आनुवंशिक पुष्टि
अध्ययन के मुताबिक, भारत में इससे पहले कैस्पियन कोबरा (Naja oxiana) के काटने से मौत का कोई मामला रिपोर्ट नहीं हुआ था। चंबा में इस प्रजाति की मौजूदगी की आनुवंशिक पुष्टि 2019 में हुई थी। यह सांप मुख्य रूप से पीर पंजाल की करीब 2,000 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में पाया जाता है। स्थानीय स्तर पर इसे ‘खड़पा’ नाम से भी जाना जाता है।
2020 और 2021 में गई दो लोगों की जान
पहले मामले में भरमौर के उल्लांसा गांव का 40 वर्षीय व्यक्ति 6 जुलाई 2020 को सेब के बगीचे में दवा का छिड़काव कर रहा था। इसी दौरान उसका पैर सांप पर पड़ गया और उसे दो बार डंस लिया। सांस लेने में परेशानी के बावजूद वह पहले स्थानीय धार्मिक उपचारकर्ता के पास गया। हालत गंभीर होने पर अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। दूसरा मामला चुराह घाटी के भांजरारू गांव का है, जहां 7 जुलाई 2021 को 62 वर्षीय व्यक्ति को काम पर जाते समय सांप ने बाएं पैर में डंस लिया। करीब आधे घंटे में वह बेहोश हो गया और अस्पताल पहुंचने पर मृत घोषित कर दिया गया। पोस्टमार्टम में दंश के निशान भी मिले।
प्रभावशीलता पर अध्ययन ने उठाए सवाल
शोध में बताया गया है कि भारत में इस्तेमाल होने वाला सामान्य एंटी-स्नेक वेनम नाग, रसेल वाइपर, करैत और फुरसे के विष को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है। अध्ययन में उद्धृत शोध के अनुसार, यह एंटीवेनम कैस्पियन कोबरा के विष के कुछ प्रमुख घटकों को प्रभावी ढंग से निष्क्रिय नहीं कर पाता। इसके विष का हृदय पर तेज असर पड़ने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है। अध्ययन में 2001 और 2006 के दो बचने वाले मामलों का भी जिक्र है, जिनमें अस्पताल में एंटीवेनम उपलब्ध न होने पर ‘मिर्चाड़ी’ (Pergularia daemia) से बने स्थानीय उपचार का इस्तेमाल किया गया था।
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